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17 अगस्त 2017

|| खाखी || || कर्ता मितेशदान गढवी(सिंहढाय्च) ||

*|| रचना :खाखी  ||*
*||कर्ता: मितेशदान महेशदान गढ़वी(सिंहढाय्च)||*
*|| छंद: त्रिकुट बंध ||*

गरवोय  देश     गणावियो,
रुताबो रणक  रणकावियो,
चिर धरण खाखी चाहियो,
लोका रखण को लाज, 

शिर नील   टोपी       शोहती,
वीर  छटा *मीत* मन मोहती,

पद अडग धर अरु कमर कसकर,
सबळ मनो बळ जबर   जसकर,
वटक  कुळ  बर सबर    दटकर,
सटक लठ सर   पटक    पटपर,
दटक मन धर    तरक    रटकर,
झटक  जबरन   चोर     झटकर,
पलक   पकडत जात    कटघर,
झलक छलकत चपळ    नटवर,
बंकडो बन बाज(१)

दन सटीक कुळ मुख दाटीयो,
कटु चरित लोकन    काटियो,
वद शिस्त  शाशन     वाटियो,
लोका रखण को लाज,

रीत   राज    कारण      राज में,
कीत नीतन सुख  सव  काज में,

जद ज्वाल जळकत अळ्या अकळत,
       हाल हरकत    बिगड़   वकळत,
       दोष  उमड़त    ठार      ठणकत,
       भार   भु  पिस्तौल       सणकत,
       मांन     मोभा  शान      मलकत,
       वीर  हो     बलिदान     झलकत,
       अकळ  तन मन सबळ  वलखत,
       जकळ मति शुर ध्यान  ढ़लकत,
       गरवो धुरंधर गाज,(२)
    
  
*🙏~~~मितेशदान(सिंहढाय्च)~~~🙏*

*कवि मीत*

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