खट विधानी काव्य
मनहर छंद
रचियता - बह्मानंद स्वामी (लाडुदान)
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28 जुलाई 2017
26 जुलाई 2017
शब्दालंकार-सवैया - ब्रह्मानंद स्वामी
*शब्दालंकार-सवैया*
या मगरी मगरी तगरी, नगरी, नगरी सगरी बगरी है,
वाट परी डगरी डगरी,सगरी सगरी कगरी अगरी है;
शीश भरी गगरी गगरी, पगरी घुघरी उगरी भूगरी है,
ब्रह्ममुनि द्रगरी फगरी, लगरी लगरी रगरी रगरी है. ।। 1।।
*रचियता - ब्रह्मानंद स्वामी*
हकीकतमां ऐम कहे छे के, ऐक समये गोपीओऐ माताजी जशोदाजीनी आगळ जईने फरीयाद करी के, तमारा कानजी वृन्दावनमां एमने हेरान करे छे, माटे तमो तेने ठपको आपो.
*भावार्थ :-*
आ मारगे में तेओने तगडी तोये तेओ नगरीमां पेठी नहीं; ते सघळी (बगडी) खोटी छे; ते त्यांथी रस्ते पडीने डगलुं डगलुं भरती हती; पण ते पंखीणी मांनी पंखीणी जेवी अने कागळीओमां आगली ऐटले आगळ वधे ऐवी छे; माथे गागर भरेली हती अने धीमे धीमे पगलीओ (पगलां) भरती हती; तेना पगना झांझरनी घुघरीउं उछळीने (तुटी जवाथी) 'भू' भोंय ऊपर पडी गई छे, (ते अमो वीणीऐ छीऐ) ब्रह्मानंद स्वामी कहे छे के, भगवाने कह्युं के, नेत्रनी दगाखोर मने फगी जतां लगार में (रगडी छे) हेरान करी छे.
*संदर्भ :- ब्रह्मानंद स्वामी जीवन दर्शन (पाना नं-179 परथी)*
टाईप बाय :- www.charanisahity.in
24 जुलाई 2017
भगवान शिवनी स्तुती रचना :- श्री ब्रह्मानंद
हरे सब दु:ख भकतन के, दयाकर होतो ऐसा हो.
सदा शिव सर्व वरदाता… टेक
रमे नित संग गिरीजा के, रमाण घर हो तो ऐसा हो.
सदा शिव सर्व वरदाता.… (१)
कला मस्तक में चंदरकी, मनोहर हो तो ऐसा हो.
सदा शिव सर्व वरदाता.… (२)
धरा सब कंठ में पी कर, वीषंधर हो तो ऐसा हो.
सदा शिव सर्व वरदाता…(३)
दिया सब राज दुनिया का, दिलावर हो तो ऐसा हो.
सदा शिव सर्व वरदाता…(४)
बनाया खास गण अपना, अमर कर होतो ऐसा हो .
सदा शिव सर्व वरदाता…(५)
उडाये एक ही सरसे, त्रिपुंडहर हो तो ऐसा हो.
सदा शिव सर्व वरदाता…(६)
कीया सब ध्वंस पलभर में, भयंकर हो तो ऐसा हो.
सदा शिव सर्व वरदाता…(७)
वो ब्रह्मानंद दुनिया में, उजागर होतो ऐसा हो.
सदा शिव सर्व वरदाता…(८)
20 फ़रवरी 2017
अमीरी क्या बीचारी है :- रचना ब्रह्मानंद स्वामी
♻🌷🍁🍃🍂🍁🍃🍂🍁🍃🍂🍁🍃🍂🍁🌷♻
🌺फकीरी में मज़ा जीस को, अमीरी क्या बीचारी है ।। 🌺
फकीरी में मज़ा जीस को, अमीरी क्या बीचारी है.......
तजे सब काम दुनिया के, फीकर घरबार के छूटे.... 2
सदा एकांत में वासा, याद प्रभु की प्यारी है ।।
फकीरी में मज़ा जीस को, अमीरी क्या बीचारी है......
नहीं नोकर कीसी जनके, न दिल में लालसा धनकी.... 2
सबूरी धार कर मनमें, फिरे जंगल विहारी है ।।
फकीरी में मज़ा जीस को, अमीरी क्या बीचारी है........
मिला सतसंग संतन का, चले नित ज्ञान की चर्चा.... 2
पिछाना रूप अपने को, द्रैत सब दूर टारी है ।।
फकीरी में मज़ा जीस को, अमीरी क्या बीचारी है.......
सभी जग जीव सें प्रीती, बराबर मान अपमाना..... 2
वो " ब्रह्मानंद " पूरण में, मगन दिन रैन सारी है ।।
फकीरी में मज़ा जीस को, अमीरी क्या बीचारी है.........
🌸 ।। जय नारायण ।। 🌸🏵 ।। जय गुरूदेव ।। 🏵
♻🌷🍁🍃🍂🍁🍃🍂🍁🍃🍂🍁🍃🍂🍁🌷♻
13 फ़रवरी 2017
कीस देवता ने - रचना ब्रह्मानंद स्वामी
कीस देवता ने आज मेरा,
दिल चुरा लीया.
दुनिया की खबर ना रही,
तन को भुला दिया.
किस देवता ने...
रहता था पास में सदा,
लेकीन छूपा हुआ
करके दया दयाल ने,
पडदा ऊठा लीया.
किस देवता ने...
सुरज वो था न चांद था,
बिजली न थी वहां.
अकदम वो अजब शानका,
जलवा दिखा दिया.
किस देवता ने
फीरके जो आंख खोलकर,
ढुंढन लगा ऊसे,
अंदर में था बाहिर सोइ,
दिलदार पा लीया.
किस देवता ने
करके कसुर माफ मेरे,
जन्म जन्म के,
"ब्रह्मानंद' अपने चरण मे
मुजको लगा लीया.
किस देवता ने...
26 नवंबर 2016
श्री सिध्धेश्र्वरा महादेव नी स्तुति :- चारण कवि ब्रह्मानंद जी स्वामी
🌞श्री सिध्धेश्र्वरा महादेव नी स्तुति
दुहो
पारवति पति अति प्रबल ,विमल सदा नरवेश
नंदि संग उमंग नीत समरत जेहि गुन शेष
छंद त्रिभंगी
समरत जेहि शेषा दिपत सुरेशा पुत्र गुणेशा निज प्यारा
ब्रह्मांड प्रवेशा प्रसिध्ध परेशाअजर उमेशा उघ्धारा
बेहद नरवेसा क्रत सिर केशाटलत अशेषा अधरेशा
जयदेव सिध्धेशा हरन कलेशा मगन हमेशा माहेशा 1
भक्तन थट भारी हलक हजारी ,कनक अहारी सुखकारी
सिर गंग सुंधारी द्रढ ब्रह्मचारी हरदुख हारी त्रिपुरारी
रहे ध्यान खुमारी ब्रह्म विहारी गिरजा प्यारी जोगेशा
जयदेव सिध्धेशा हरन कलेशा मगन हमेशा माहेशा 2
कैलाश निवासी जोग अध्यासी रिध्धि सिध्धि दासी प्रति कासी
चित व्योम विलासी हित जुत हासी रटत प्रकासी सुखरासी
मुनि सहस्त्र अठयासी कहि अविनासी जेही दुख त्रासी उपदेशा
जयदेव सिध्धेशा हरन कलेशा मगन हमेशा माहेशा 3
गौरीनीत संगा अति सुभ अंगा हार भुजंगा सिर गंगा
रहवत निज रंगा उठत अवंगा ज्ञान तरंगा अति चंगा
उर होत उमंगा जयक्रत जंगा अचल अभंगा आवेशा
जयदेव सिध्धेशा हरन कलेसा मगन हमेसा माहेशा 4
नाचंत नि:शंका मृगमद पंका घमघम घमका घुघरू का
ढोलु का धमका होव हमका डम डम डमका डमरु का
रणतुर रणंका भेर भणंका गगन झणंका गहरेशा
जयदेव सिध्धेशा हरन कलेशा ,मगन हमेशा माहेशा 5
मणिधर गल माळा भुप भुजाळा शिश जटाळा चरिताळा
जगभुल प्रजाळा शुळ हथाळा जन प्रतिपाळा जोराळा
दंग तुतिय कराळा हार कुणाळा रहत कपाळा राकेशा
जयदेव सिध्धेशा हरन कलेशा मगन हमेशा माहेशा 7
खळकत शिर निरा अदल अमिरा पिरन पिरा हर पिरा
विहरत संग विरा ध्यावत धीरा गौर सरीरा गंभीरा
दातार रधिरा जहाज बुध्धिरा कांत सिध्धिरा शिर केशा
जयदेव सिध्धेशा हरन कलेशा ,मगन हमेशा माहेशा 7
नररुप बनाया अकळ अमाया कायम काया जगराया
तनकाम जलाया साब सुहाया मुनिउर लाया मनभाया
सिध्धेसर छाया जनसुख पाया मुनि ब्रह्म गाया गुणले शा
जयदेव सिध्धेशा हरन कलेशा ,मगन हमेशा माहेशा
🌞छप्पय
जय जय देव सिध्धेश शेष निश दिन गुण गावे
दरश परस दुखदुर सुरजन अंतर लावे
अणभय अकळ अपार सार सुंदर जग स्वामी
अगणित कीन उध्धार नार नर चेतन धामी
नररूप मुर्ति नवल नहि शंख्या जेहि नाम की
कहे ब्रह्म मुनि बलिहारी मे शिध्धेशर जग सामकी
( चारण कवि ब्रह्मानंद जी स्वामी )
🌞टाईप हरि गढवी
गाम ववार ता मुंदरा
मो 96380 41145
14 जून 2016
27 मार्च 2016
ब्रह्मानंद स्वामीने ऐक रचना
वाट परी डगरी डगरी,खगरी खगरी कगरी अगरी हे;
सीस भरी गगरी पगरी, पगरी घुघरी उगरी भु गरी हे;
ब्रह्ममुनि द्रगरी दगरी, लगरी लगरी फगरी रगरी हे; ।।
घुंघटकी घटकी रटकी, लटकी लटकी तटकी कटकी हु;
ज्यों पटकी थटकी थटकी, खटकी खटकी हटकी हटकी हुं;
ब्रह्म लज्यो झटकी झटकी, वटकी वटकी जटकी जटकी हुं; ।।
माखनमें खनमें न नमें, धनमें धनमें उनमें गनमें जूं;
आपनमें पनमें रनमें, छनमें छनमें जनमें अ नमें जूं;
ब्रह्ममुनि फनमें थन, मेडनमें भनमें भनमें चनमें ज्यूं; ।।
कुंडलके तलके चलके मनु, मिन मिनहुके बलके हलके ही;
नारी चली जलके छलके, गलके नलके वलके दलके ही;
ब्रह्ममुनि पलकेफलके भलके, सलके डलके ढलके ही; ।।
या तयकी तयकी अयकी, मयकी मयकी भयकी भयकी री;
हे गयकी गयकी गयकी सयकी, सयकी बयकी बयकी री;
जो खयकी कयकी कयकी, कहे ब्रह्ममुनि जयकी जयकी री; ।।
हे जुं बरी जुबरी, छुबरी डुबरी डुबरी उबरी तुबरी हे;
में बुबरी थुबरी मुबरी कुबरी, कुबरी कुबरी कुबरी हे; ।।
25 मार्च 2016
रेणकी छंद - ब्रह्मानंद स्वामी
सर सर पर सधर अमर तर अनसर,करकर वरधर मेल करै।
હરિહર સૂર અવર અછર અતિ મનહર, ભર ભર અતિ ઉર હરખ ભરે,
हरिहर सुर अवर अछर अति मनहर, भर भर अति उर हरख भरै
નિરખત, નર પ્રવર, પ્રવરગણ નિરઝર, નિકટ મુકુટ શિર સવર નમે,
निरखत नर प्रवर प्रवरगण निरझर, निकट मुकुट सिर सवर नमै।
ઘણ રવ પર ફરર ધરર પદ ઘૂઘર, રંગભર સુંદર શ્યામ રમે જી…રે….
घण रव पर फरर धरर पद घुघर, रंगभर सुंदर श्याम रमै।
ઝણણણણણ ઝણણ ખણણ પદ ઝાંઝર, ગોમ ઘણા ગણણણણ ગયણે
झणणणणण झणण खणण पद झांझर, गोम घणा गणणणण गयणै।
તણણણ બજ તંત ઠણણણ ટંકારવ, રણણણ સુર ધણણણ રયણે
तणणण बज तंत ठणणण टंकारव,रणणण सुर धणणण रयणै।
ત્રહ ત્રહ અતિ ત્રણણ ધ્રણણ બજ ત્રાંસા, ભ્રમણ ભમર વત રમણ ભ્રમે.
त्रह त्रह अति त्रणण ध्रणण बज त्रासा,भ्रमण वत रमण भ्रमै।
ઘણ રવ પર ફરર ધરર પદ ઘૂઘર, રંગભર સુંદર શ્યામ રમે જી…રે…..
घण रव पर फरर धरर पद घुघर, रंगभर सुंदर श्याम रमै।
ઝટ પટ પર ઉલટ પલટ નટવત ઝટ, લટ પટ કટ ઘટ નિપટ લલે
झट पट पर उलट पलट नटवत झट, लट पट कट घट निपट ललै।
કોકટ અતિ ઉકટ ત્રુકટ ગતિ ધિન કટ, મન ડરમટ લટ લપટ મલે.
कोकट अति उकट गति धुन कट, मन डरमट लट लपट मलै।
જમુના તટ પ્રગટ અમટ અટ રટ જૂટ, સૂર પટ ખેખટ તેણ સમે,
जमुना तट प्रगट अमट अट रट जूट, सूर पट खेखट तेण समै।
ઘણ રવ પર ફરર ધરર પદ ઘૂઘર, રંગભર સુંદર શ્યામ રમે જી….રે….
घण रव पर फरर धरर पद घुघर, रंगभर सुंदर श्याम रमै।
ધમંધમ અતિ ધમક ઠમક પદ ઘૂઘર, ધમધમ ફળ સમ હોત ધરા,
धमंधम अति धमक ठमत पद घूमर,धमधम फळ सम होत धरा।
ભ્રમ ભ્રમ વત વિષય પરિશ્રમ વ્રત ભ્રમ, ખમ ખમ દમ અહી વિડૂમ ખરા,
भ्रम भ्रम वत विषय परिश्रम व्रत भ्रम, खमखम दम अहि विडुम खरा।
ગમ ગતિ અતિ અગમ નિગમ ન લહત ગમ, નટવત રમઝમ ગમ મન મેં
गम गति अति अगम निगम न लहत गम, नटवत रमझम गम मन में।
ધણ રવ પર ફરર ધરર પદ ઘૂઘર, રંગભર સુંદર શ્યામ રમે જી….રે…
घण रव पर फरर धरर पद घुघर, रंगभर सुंदर श्याम रमै।
ગત ગત પર ઊગત તૂગત, નૃત, પ્રિયગત રત ઉનમત, ચિત્ત વધત રતિ,
गत गत पर ऊगत तूगत नृत प्रियगत, रत उनमत चित वधत रति।
તત પર ઘ્રત નચત ઉચત મુખ થૈથત, આબ્રત અત ઉત ભ્રમત અતિ,
तत पर घ्रत नचत उचत मुख थैथत, आब्रत अत उत भ्रमत अति।
ધિધીતત ગત વજત ભ્રદંગ, સૂર ઉધધત, કૃત ભ્રત નર તમ અતંત ક્રમે,
धिधितत गत वजत मृदंग सुर उपजत, कृत भ्रत नर तम अतंत क्रमै।
ધણ રવ પર ફરર ધરર પદ ઘૂઘર, રંગ ભર સુંદર શ્યામ રમે જી…. રે….
घण रव पर फरर धरर पद घुघर, रंगभर सुंदर श्याम रमै।
ઢલ ઢલ રંગ પ્રગલ અઢલ જન પર ઝલ ઝલ અણ કલ તેજ ઝરે
ढल ढल रंग प्रगल अढल जन पर झल,झल अल कल तेज झरै।
ખલખલ ભૂજ ચુડ ચપલ અતિ ખલકત કાન કતોહલ પ્રબલ કરે,
खलखल भुज चूड़ चपल अति खमकत, कान कतोहल प्रबल करै।
વલવલ ગલ હસ્ત તુ મલ ચલ ચિતવલ, જુગલ જુગલ પ્રતિ રંગ જમે
वलवल गल हस्त तु मल चल चितवल, जुगल जुगल प्रति रंग भरै।
ધણ રવ પર ફરર ધરર પદ ઘૂઘર, રંગભર સુંદર શ્યામ રમે જી….રે….
घण रव पर फरर धरर पद घुघर, रंगभर सुंदर श्याम रमै।
સરવસ વસ મોહ દરસ સુરથિત શશિ, અરસ પરસ ત્રસ ચરસ અતિ
सरवस वस मोह दरस सुरथित शशि, अरस परस त्रस चरस अति।
કસકસ પટ હુલસ વિલસ ચિત આક્રશ, રસ બસ ખુસ હસ વરસ રતિ,
कसकस पट हुलस विलस चित आकृष, रस बस खुश हस वरस रति।
ટ્રસ નવ રસ સરસ ભયો બ્રહ્માનંદ, અનરસ મનસ તરસ અધમે,
ट्रस नव रस सरस भयो ब्रह्मानंद, अनरस मनस तरस अधमै।
ધણ રવ પર ફરર ધરર પદ ઘૂઘર, રંગભર સુંદર શ્યામ રમે જી….રે….
घण रव पर फरर धरर पद घुघर, रंगभर सुंदर श्याम रमै।

