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21 जनवरी 2017

||केम न आवे कान|| - रचना: जोगीदान गढवी (चडीया)

.           *||केम न आवे कान||*
.                *राग: माढ*
.    *रचना: जोगीदान गढवी (चडीया)*

मारी भीड सुंणी भगवान रे तुं, केम न आवे कान.
सामळीया वर सुं समजावुं,,वेधूं तुं विदवान रे..
मारी भीड सुंणी भगवान रे तुं, केम न आवे कान......टेक

नावलीयो कही वाट निहाळुं..भूली हुं जग भान..
रांणे घोळी ने त्राहळ रेड्युं..जोने लेवाय जान रे..
मारी भीड सुंणी भगवान रे तुं, केम न आवे कान...||01||

छोड नही रण छोड फरीथी, मोहन आ मेदान
मारी मने परवा नई माधा, होशे तारीज हाण रे
मारी भीड सुंणी भगवान रे तुं, केम न आवे कान...||02||

त्रिकम जमुना तट पर हुतो.. नटखट तुं नादान
गोकळ नी हुं एज छुं गोपी, पारख ने पेहचान..
मारी भीड सुंणी भगवान रे तुं, केम न आवे कान...||03||

रावुं अमांणी सांभळ रावु..कान धरो ने कान..
माढ मीरां अने माळवोे माधा, जहर ने जोगीदान रे..
मारी भीड सुंणी भगवान रे तुं, केम न आवे कान...||04||

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