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23 मई 2017

श्री नरसिँह अवतार की स्तूति

श्री नरसिँह अवतार की स्तूति

        ■◆■ ••• बिकट रूप नरसिंघ बणे •••■◆■
                   ।। दोहा ।।
समय एक प्रहलाद सूँ,कीन असुर अति क्रौध ,
कोट बिकट चहुँ दिश करी,जबर घेरी बङ जोध .

पिता दैत निज पुत्र से,बौलत है तिही बैर ,
कहै राम तव नाथ कित,तुरंत लैहूँ अब टैर .

कठीन थँभ धखी लाल करी,बाहु खड्ग बिकराल,
हरि बतावहूँ हाल मोही,करौँ पुत्र तब काल .

                          ।। छंद: रेणकी ।।
सुनियत अत भ्रमत नमत मन हरिसन,भगत मुगत भगवत भजनं ,
सुरपत पत महत रहत रत समरत,सत द्रढ व्रत गत मत सजनं ,
धत लखत रखत जगपत उर धारण ,सुरत पुकारण श्रवण सुणै ,
भट थट असुरांण प्रगट घट भंजण,बिकट रुप नरसिँघ बणै ,
                                     जिय बिकट रूप नरसिंघ बणै {1}

कडडडड ब्रहमाँड इकि सह कडकत,अडड अडड दधिजल उछलं ,
धड धड धर धमक थडड भय भूधर,खडड मेरु शिव ध्यांन खुलं ,
तड तड सुर दुंद धडक असुरा तन,गडड हास्य अट हडड गणै,
भट थट असुरांण प्रगट घट भंजण,बिकट रुप नरसिंघ बणै {2}

थररररर थंभ फटत धर थर हर,फरर कोट फर हरर फनं ,
डर डर मुख वकर भयंकर देखत,झरर तेज झर हरर तनं ,
कर कर जन अमर समर खय कर कर, डर डर दैत सु प्राण दणै ,
भट थट असुरांण प्रगट घट भंजण,बिकट रुप नरसिँघ बणै {3}

कट कट रट भृकुट त्रकुट मुख भयकट, लपट झपट द्रग त्रगट ललं ,
झट पट अंग ऊलट पलट कर झंपिय,चपट चोट अति दुपट चलं ,
परगट झट पटक हिरण कश्यप प्रभु,खट खट घट नख फटत खणै,
भट थट असुरांण प्रगट घट भंजण,बिकट रुप नरसिँघ बणै {4}

धक धक धक धधक धधक रुधिरन धक,थरक ऊझक झक शेष थियं,
शक पक मग अरुण अरक रथ चुकिय,हक बक थक सब असुर हियं ,
चक मक उर चमक दमक दैखत चख,भभक भभक रव घोर भणै ,
भट थट असुरांण प्रगट घट भंजण,बिकट रुप नरसिंघ बणै {5}

घणणणणण शंख दुदूँभी घौरण,भणण वेद मुख ब्रह्म भणै ,
झणणणण झणकार झरन फूलन झड,हणण दैत गण अगण हणै ,
बणणण बल बाहू गणण कुण बिक्रम, रियण नाद जय जय रयणै,
भट थट असुरांण प्रगट घट भंजण, बिकट रुप नरसिँघ बणै {6}

झळझळ अति कमळ न्रमळ मुख झळकत,भळळ तेजबळ प्रबळ भवं,
पळ पळ चल बिचळ रमा नहीँ पैखत,नकळ अकळ हरि रुप नवं ,
फल फल मुनि देव सकळ द्रग देखत,पल मह खल दल नाश पणै ,
भट थट असुरांण प्रगट घट भंजण,बिकट रुप नरसिंघ बणै {7}

जन जन धुनी सजन भगत जन जन प्रति,प्रसन वदन प्रहलाद परं ,
तन तन निज शरन चरन निज जन तिहि,धरन उरन शिर भूजन धरं ,
प्रमि तन श्रुति भनन सनन सत वन प्रभु,घन "रवि"कवि जय शब्द घणै,
भट थट असुरांण प्रगट घट भंजण, बिकट रुप नरसिंघ बणै {8}
         ।। कळश छन्द :छप्पय ।।
नाथ जयति नरसिंघ,बिकट तन रुप बणावण,
नाथ जयति नरसिंघ,निपट खल झुँड नशावण ,
नाथ जयति नरसिंघ,जपत जन कष्टहि जारन ,
नाथ जयति नरसिंघ,बाहु बल दुष्ट बिडारन,
त्रय लोक श्याम समराथ तुंही, वेषहि अदभुत्त धर वयं,
कृत अमित नाथ "रवि"कवि कहत,नाथ जयति नरहरि जयं,

कर्ता :चारण कवि श्री रविराज सिंहढायच -मुळी सोराष्ट
कवि श्री रविराज सिंहढायच कृत श्री नर्मदा लहरी माथी साभार

◆सम्पादन प्रकासन◆
श्री शंकरदानजी जेठीभाई देथा लिमडी कविराज

★टाईप अने प्रेषित★
चारण कवि प्रवीण मधुडा राजकोट
97239 38056

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