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17 मार्च 2019

छंद :- त्रिभंगी रचियता वरदान गढवी

*।। दोहा ।।*
गाथा सुनी सद्गुरुकी, लगा हृदयमें बाण ।
प्राची भई सब दिशाए,हुआ उदित उर भाण ।।

माना कुतूहल मनका,हुआ तमसका भंग ।
रोम रोम पुलकीत भया,स्फुरत छंद त्रिभंग ।।

       *।। छंद :- त्रिभंगी ।।*

संसार सुहावे,जब सुख आवे,दु:खडो लावे,ना भावे ।
मीठपडा माळे,दिलडो दाडे,साच सुनावे,ना फावे ।
कटु निंदा गावे, देह धुणावे, मुख मरकावे, कू-रागी ।
दुनियामें आवें,समज न पावें,जनम बिगाडें,मतभागी ।।

वरतमान भुलाइ,काल भवि भाइ,भूत रुलाई,रोजाई ।
मन धरी मुरखाइ,पाप बढाई, समज न पाई, मनचाई ।
होवेसो न भाइ, और मगाई, जगमें ठगाइ, धन-लागी ।
दुनियामें आवें,समज न पावें,जनम बिगाडें,मतभागी ।।

अंतर महीं रागा ,कंठमें धागा,माथे शाखा,मुख रामा ।
करनी में काला, अंतर ठाला,फेरे माला,धनश्यामा ।
ध्यान लगे बावा, बाकी साला,और न भाला, इस-लागी ।
दुनियामें आवें,समज न पावें,जनम बिगाडें,मतभागी ।।

धरती उब लागी,सो-धनभागी,खोजत लागी,सतसाथी।
साक्षीमें साची, *में*-को' भागी,शांती साधी,इस मांथी ।
बाकी सब ठागी,कछुना लागी,नाटक नाटी,सब माटी ।
दुनियामें आवें,समज न पावें,जनम बिगाडें,मतभागी ।।

उर गंतव्य गंदा,मतिसें मंदा,राखे रंदा, सब हंदा ।
मनचाइ करंता,ना डरपंता,लोक रूदंता,मूफंदा ।
चौरसी चडंता,फेर फरंता ,मिटे न फंदा,जो-लागी ।
दुनियामें आवें,समज न पावें,जनम बिगाडें,मतभागी।।

शीखलें तु खुदसें,अपनी भुलसें,होवे मनसें,खुद राजा ।
कर ध्यान करमसें,हरपल पलसें,
करते बनसे,तू-ख्वाजा ।
*वरदान* समजले,मन में मजले,भाग न पगलें,इस लागी ।
दुनियामें आवें,समज न पावें,जनम बिगाडें,मतभागी ।।

          *।। छप्पय ।।*

सद्गुरू किजीए समरथ,रथ मनस ठहरावे ।
सद्गुरू किजीए समरथ,भूत भवि मिटावे ।।
सद्गुरू किजीए समरथ,प्रेम ध्यान पढावे ।
सद्गुरू किजीए समरथ,ज्ञान ज्ञान नशावे ।।
ज्ञान प्रेम की लगाइ लगन,मनन स्वयं ही शीखायो।
करुणा करी सद्गुरूने, *दान'*,आनंद सहजही पायो ।।

                    *:- वरदान गढवी*(8758323886)

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