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"जय माताजी मारा आ ब्लॉगमां आपणु स्वागत छे मुलाक़ात बदल आपनो आभार "
आ ब्लोगमां चारणी साहित्यने लगती माहिती मळी रहे ते माटे नानकडो प्रयास करेल छे.

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Notice Board


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27 अक्टूबर 2016

।। नदी रुपाळी नखराळी।। रचयिता -कवि दादूदान प्रतापदान मीसण

।। नदी रुपाळी नखराळी।।
     
             ।।छंद – त्रिभंगी।।
डुंगर सूं दडती, घाट उतरती, पडती पडती, आखडती।
आवै उछळती, जरा नि डरती, हरती फिरती, मद झरती।
किलकारां करती, डगलां भरती, जाय गरजती जोराळी।
हिरण हलकाळी,जोबन वाळी,नदी,रुपाळी, नखराळी।।1।

आंकडियां वाळी, वेल घटाळी, वेलडियाळी, वृखवाळी।
अवळां आंटाळी, जांमी झाळी, भेखडियाळी, भे वाळी।
तिणने दे ताळी, जातां भाळी, लाखणियाळी लटकाळी।
हिरण हलकाळी, जोबन वाळी,नदी,रुपाळी, नखराळी।2।

जोगंद्र जटाळा, भूरी लटाळा, चाल छटाळा चरचाळा।
डणके डाढाळा, सिंहण बाळा, दस्स हथाळा, दे ताळा।
मोटा माथाळा, ग्रजवै गाळा, हिरणियाळी, हुंकारी।
हिरण हलकाळी, जोबन वाळी, नदी,रुपाळी, नखराळी।3।

गांगडिया वाळी, मां ममताळी, खोडल माडी, खपराळी।
बैठी वहां बाळी, कायम काळी, जतन कराळी, जोराळी।
थांनक लै थाळी, नैवध वाळी, मानव आवत, सरधाळी।
हिरण हलकाळी, जोबन वाळी,नदी,रुपाळी, नखराळी।4।

डेडां डळवळतां, झुंड झळुबतां, मग्गर फरता मुंह फाडै।
जळ कुकड चरतां,बतख विहरतां,दादर डहकत,दिन दाडै।
माछलियां टोळां, करे किलोळां, बुगला बहोळा,बहु भाळी।
हिरण हलकाळी, जोबन वाळी, नदी,रुपाळी, नखराळी।5।

आंबा आंबलियां, उम उंबरियां, खेर खिजडियां, बोरडियां
केसुडां कळियां,वा खाखरियां,हेम री कळियां, आवळियां।
जण प्रथी उतरियां, हूरां परियां, वेलड वळियां, जळ गाढी।
हिरण हलकाळी, जोबन वाळी, नदी,रुपाळी, नखराळी।6।

रायण कोळंभा, ले अवळंबा, जोय जळंबा, जळबंबा।
कर केश कलंबा, बिखर लंबा, जै जगदंबा, वन अंबा।
“दादल” दिल रंगी, छंद त्रिभंगी, बण्यो उमंगी, बिरदाळी।
हिरण हलकाळी, जोबन वाळी, नदी,रुपाळी, नखराळी।7।

वरखा रुत घेली, जोम भरेली, नदी नवेली, नवढा सी।
सह नदीयां पहली, जात वहेली, शायर वहाली,चपला सी।
ठेबां दे ठेली, हा हडसेली, मारग मेली, खरताळी।
हिरण हलकाळी, जोबन वाळी, नदी,रुपाळी, नखराळी।8।

फळ फूल खिलंतां, कोक किलंतां, पंछी फिरंतां, पचरंगी।
थै थै थनगनतां, मोर नचंतां, नित नरखंतां, नवरंगी।
ढेलडियां ढूंगां, चढती रुंखां, एहडा मुंगा, दरसाळी।
हिरण हलकाळी, जोबन वाळी, नदी,रुपाळी, नखराळी।9।

खळ खळ ता झरणां, लीलां तरणां,चरतां हिरणां,ठेक भरै।
कई श्वेत सु वरणां, नीलां वरणां, कंकु चरणां, फूल करै।
मधुकर गुंजारं, भांत अठारं, बनि बहारं, बिरदाळी।
हिरण हलकाळी, जोबन वाळी,नदी,रुपाळी, नखराळी।10

रचयिता -कवि दादूदान प्रतापदान मीसण
                    प्रेषक
             आशुतोष चारण
🌹 🌹 जय महाकाल ग्रुप 🌹 🌹

26 अक्टूबर 2016

चारण गाथा :- सेमिफाइनल परीणाम

चारण गाथा :- सेमिफाइनल परीणाम

GSSSB ::-  SUB AUDITOR & SENIOR CLERK RECRUITMENT DECLARED

GSSSB ::-  SUB AUDITOR & SENIOR CLERK RECRUITMENT DECLARED

▶Total Posts:
◾Sub auditor: 350 posts
◾senior clerk: 568 posts

▶Qualification: Graduate

▶Starting Date:
27-10-2016

▶Last Date:
11-11-2016

▶▶OFFICIAL NEWS:
CLICK HERE

चारणी साहित्य ब्लॉग ने 2 वर्ष पूरा थया आजे

जय माताजी
मां भगवती सोनल अने कुळदेवीमां मोमायना आशीवार्द तथा वडीलोना आशीर्वाद अने आप बधा भाईओ ना सहकारथी आजे चारणी साहित्य ब्लॉगने 2 वर्ष पुरा थया
*➡ ब्लॉग बनाववानो हेतु :-*
चारणी साहित्य ब्लॉगना माध्यमथी युवानोने भरतीनी माहिती आपवी अने चारणी साहित्यनुं प्रचार प्रसार करवुं, साहित्यनुं जतन करवुं वगेरे
*➡ ब्लॉग शरू :- 26-10-2014*
*➡ ब्लॉगना कुल मुलाकातीयो :- 5,64,713*
➡ चारणी साहित्य ब्लॉगनी मुलाक़ात लेनार दरेक मुलाकातीओनो खूब खूब आभार
➡ आ ब्लॉग बनावी आपनार मारा परम मित्र श्री पुरणदास गोंडलियानो खूब खूब आभार (http://www.pgondaliya.com)
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        सहकार माटे आभार
       वंदे सोनल मातरम् 

कविराज श्री खूमदानजी बारहठ

"कविराज श्री खूमदानजी बारहठ"
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भारतवर्ष की चारण काव्य महापुरुष परम्परा में कविराज श्री खूमदानजी बारहठ का नाम विशेष सम्मान और गौरव का प्रतीक है। कविराज श्री खूमदानजी बारहठ का जन्म पाकिस्तान के चारणवास ग्राम भीमवेरी, तहसील-नगरपारकर, जिला-थरपारकर, सिंध प्रदेश में दिनांक 08 फरवरी 1911, विक्रम संवत 1968 माघ शुक्ल द्वादशी,  शुक्रवार को श्री लांगीदानजी बारहठ ( पुनसी बारहठ, मूल निवासी भादरेस, बाड़मेर, भारत ) के घर हुआ था।

कविराज जन्म से ही प्रतिभा संपन्न बालक थे। आपकी प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा तत्कालीन विख्यात संत श्री संतोषनाथजी के श्रीचरणों में सम्पूर्ण हुई थी। गुरु श्रीचरणों में आपको गुजराती, हिंदी एवं सिंधी भाषाओँ का ज्ञान प्राप्त हुआ। आपने अल्पायु में रामायण, गीता, महाभारत, चारों वेद, रघुनाथ रूपक, सत्यार्थ प्रकाश, रूपद्वीप पिंगल आदि प्रमुख धर्म ग्रंथो का विधिवत अध्ययन कर लिया था। गुरु अनुकम्पा एवं शाश्त्रों के गहन अध्ययन से आपके विचारों में परिपक्वता बढ़ी और आप काव्य रचना की और अग्रसर हुए।

कविराज श्री खूमदानजी बारहठ ने सर्वप्रथम वीररस में दो सौ छंदों के साथ वीर रामायण का सृजन किया। इसके पश्चात आपने अनेक विषयों पर काव्य एवं गद्य लेखन के साथ महत्वपूर्ण धर्म-ग्रंथों की रचनाएँ की। आपकी कालजयी रचनाओं में विषद काव्य ( सांसारिक अनुभूतियों की समालोचना ), रंग-तरंगिणी ( देवों, दातारों एवं वीर पुरुषों की प्रशस्तियों का संग्रहण ),  मानव धर्म नीति ( आठ सौ दोहो का काव्यग्रन्थ ), भारत विजय प्रकाश ( भारत-पाक 1971 युद्ध पर भारतीय वीरों की शहादतों पर सुयश ), सत्यार्थ प्रकाश ( स्वामी दयानंद सरस्वती के सत्यार्थ प्रकाश ग्रन्थ की समसामयिक विवेचना ) आदि प्रमुख रूप से उल्लेखनीय लेखन कृतियाँ है।

पाकिस्तान के भडेली एवं अमरकोट के तत्कालीन सोढ़ा शासकों यथा श्री जैतमालसिंह सोढ़ा आदि ने आपको कविराज की उपाधि ( पदवी ) से सम्मानित कर आपकी काव्य प्रतिभा को सरंक्षण प्रदान किया था। कविराज श्री खूमदानजी बारहठ ने सोढ़ा शासकों यहाँ अपने प्रवास के दौरान अनेक काव्य ग्रन्थों की रचना कर पाण्डुलिपि लेखन कार्य सम्पूर्ण किया था।

दुर्भाग्य से इस बीच घटित भारत-पाक 1971 की युद्ध विभीषिका से पाक में निवासित हिन्दू समुदाय को रातों-रात भारतभूमि पलायन करना पड़ा। कविराज श्री खूमदानजी बारहठ को भी सपरिवार इसी युद्ध विभीषिका का शिकार हो कर भारत में शरण प्राप्त करनी पड़ी। कवि भारत चले आये लेकिन उनकी अप्रकाशित काव्य पांडुलिपियाँ पाकिस्तान के सोढ़ा शासकों के पास ही रह गयी जिनका आपके शेष जीवन तक पता नहीं चल सका।

कविराज खूमदानजी बारहठ अपनी वृद्धावस्था में राजस्थान के बीकानेर जिले के पूगल ग्राम में रहे जहाँ दिनाँक  26 अक्टूबर 2001, विक्रम संवत् 2058, कार्तिक कृष्ण पक्ष पंचमी, शुक्रवार को 91 वर्ष की दीर्घ आयु में आप देवलोक गमन कर गये।

कविराज श्री खूमदानजी बारहठ सत्यनिष्ठता एवं वैज्ञानिक सिद्धान्तों के पक्षधर थे। आपने आई श्री सोनल माताजी एवं प्रसिद्ध चारण कवि श्री दुला भाया काग से स्नेहिल भेंट कर चारण समाज के उत्थान एवं समृद्धि पर विवेचनात्मक आलेख भी लिखा था। कविराज का रेगिस्तानी दूरस्थ ग्रामीण वास ( पाकिस्तान में ) होने के कारण आपके काव्य का प्रचार-प्रसार अधिक नहीं हो सका। सत्यार्थ प्रकाश एवं भारत विजय प्रकाश वर्तमान में प्रकशित एवं उपलब्ध कृतियाँ है। शेष उपलब्ध अन्य पांडुलिपियों का भाषा अनुवाद एवं प्रकाशन करवाए जाने के प्रयास जारी है।
चारण समाज की महान विभूति कविराज श्री खूमदानजी बारहठ को, मैं उनकी सोलहवीं पुण्यतिथि पर कोटि-कोटि श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूँ !

करणीदान बारहठ पूगल बीकानेर राजस्थान
94142 26931

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