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20 अक्तूबर 2015

गझल रचना : जोगीदान गढवी (चडीया)

.                       || गझल ||
.         रचना : जोगीदान गढवी (चडीया)
करुं बस हुं करुं आ में कर्युं, केवो अहम करता.
जपे नई नाम जागीने, मुरख माया महीं मोया..||01||
समजता जे सिकंदर जातने, जुकवीश हुं दुनिया.
अरे अहींया महांणे ऐय, छांणां सेज पर सोया...||02||
कर्यां ना कोई सत कर्मो, फर्या बस फांकडा थईने..
धरम पर प्रित ना घारी, बुरई नां बीजडां बोया...||03||
मर्या ऐ स्वान ने मोते, रझळते देह रस्ता मां.
सगी आंखे सगा व्हाले, खलक मां ऐमने खोया..||04||
कठण करणी बुरी करनार ने, ईश्वर नही छोडे.
परावर ऐय पछतासे, रदय थी जे नथी रोया...||05||
हजी नर चेत नहीतर भागवा,  रस्तो य नई भाळे.
धरम ना खेत रक्षक ज्यां, टपी ने आवशे टोया...||06||
करे कीरतार सामैयां,  सरग नी शेरीयुं माथे..
चतुर चडीया जीवी जाशे, धरम ना दुधडे धोया..||07||
करीले काम नेकी ना , जगत पर दान जोगी तुं..
भटकता कैक भोगी ना, अमेतो आत्यमा जोया..||08||
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