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27 मार्च 2016

ब्रह्मानंद स्वामीने ऐक रचना

या मगरी मग री तगरी, नगरी न गरी सगरी बगरी हे;
वाट परी डगरी डगरी,खगरी खगरी कगरी अगरी हे;
सीस भरी गगरी पगरी, पगरी घुघरी  उगरी  भु गरी हे;
ब्रह्ममुनि द्रगरी दगरी, लगरी लगरी फगरी रगरी हे; ।।
में अटकी अटकी नटकी, चटकी चटकी मटकी फटकी हु;
घुंघटकी घटकी रटकी, लटकी लटकी तटकी कटकी हु;
ज्यों पटकी थटकी थटकी, खटकी खटकी हटकी हटकी हुं;
ब्रह्म लज्यो झटकी झटकी, वटकी वटकी जटकी जटकी हुं; ।।
जोबनमें खनमें दिनमें, घनमें तनमें कनमें मनमें जूं;
माखनमें खनमें न नमें, धनमें धनमें उनमें गनमें जूं;
आपनमें पनमें रनमें, छनमें छनमें जनमें अ नमें जूं;
ब्रह्ममुनि फनमें थन, मेडनमें भनमें भनमें चनमें ज्यूं; ।।
मुखपें अलके झलके, ललके व्रजत्रिय मीलकें कलके कलके ही;
कुंडलके तलके चलके मनु, मिन मिनहुके बलके हलके ही;
नारी चली जलके छलके, गलके नलके वलके दलके ही;
ब्रह्ममुनि पलकेफलके भलके, सलके डलके ढलके ही; ।।
नहीं बात पहांनयकी पयकी, लयकी लयकी वयकी वयकी री;
या तयकी तयकी अयकी, मयकी मयकी भयकी भयकी री;
हे गयकी गयकी गयकी सयकी, सयकी बयकी बयकी री;
जो खयकी कयकी कयकी, कहे ब्रह्ममुनि जयकी जयकी री; ।।
आंखु बरी खुबरी लुबरी दुबरी, दुबरी बुबरी गुबरी हे;
हे जुं बरी जुबरी, छुबरी डुबरी डुबरी उबरी तुबरी हे;
में बुबरी थुबरी मुबरी कुबरी, कुबरी कुबरी कुबरी हे; ।।
रचियता :- ब्रह्मानंद स्वामी(लाडुदान गढवी)

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