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3 जुलाई 2016

देखो विजय दानेहरी || रचना: जोगीदान गढवी (चडीया)

कर्ण दानेस्वरी तरीके प्रथम पंक्ति मां गणाय पण तेंणे तेना कुटुंब पर ने भायुं पर तो तीर ताक्यां हता, पण जय हो चारण समाज नी, समाज नुं ऐवुं जाजर मान व्यक्तित्व के जेमणे आई सोनल ना शब्दो अनो संदेस जीवन मां उतार्या छे, तथा समाज नी दीकरीयो भणे ते हेतु चारण छात्रालय ने चोत्रीस लाख रोकड तथा वीस लाख फिक्ष डीपोझीट करी तेना व्याज मां छात्रालय नुं मेंन्टेनन्स थई सके तेवी दिर्ध द्रस्टी थी पोतानी समजण समाज प्रेम अने दातारी नो बेनमुन दाखलो कायम कर्यो छे, तेवा सुद्ध चारण विजयदानजी सिंहढायच नी दातारी ने काव्य पुस्प थी वंदन

,         *|| देखो विजय दानेहरी ||*
,                 *छंद : सारसी*
,      *रचना: जोगीदान गढवी (चडीया)*

करणे दीधेलां दान पण, ई कटम माथे कोपीयो
लाजाळ चोपन लाख रोकड, आपतां जे ओपीयो
जेणे उपासी जोगडा, चारण समाजा चाकरी
भडवीर भारत भोममां, देखो  विजय दानेहरी,

नरसंग भांसळीया तणां,सिंह ढायसा मरदो सूरा
आखा अडीखम आ उभा, ई चारणो नई थ्या चूरा
शकती उपासक सत्य चाहक,करम उमदा केहरी
भडवीर भारत भोममां, देखो विजय दानेहरी,

मुखथी वदेली मात मढडे, भणावो दीकरी भला
दुस्कर न कोई राह देखो, पुन्य थी कापो पला
जांणे के रमती जोगडा मां आई सोनल ओहरी
भडवीर भारत भोममां, देखो विजय दानेहरी,

कोमळ रदय वांणी विवेकी, चाल उजळी चारणा
दुखीयांय देखी दोडता, ना बंध करता बारणा
अनहद लखी ईतीहास मां,ई खलक मां करीयुं खरी
भडवीर भारत भोममां, देखो विजय दानेहरी,

निंदा करी नई नातनी,पण गंग जळ समवड गणीं
जांण्या न अवगण जोगडा,बस भलायुं जगमां भणीं
वसवुं विदेसी वाट तो पण,धरम धूर कांधे धरी
भडवीर भारत भोममां,देखो विजय दानेहरी,

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