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16 अगस्त 2016

कविश्री दादनी रचना :- प्रभु तुं आपे अेटलुं ज लउ

कवि श्री दादनी रचना

*प्रभु तुं आपे अेटलुं ज लउं*

नही ओछुं वधुं कंई कउं , प्रभु तुं आपे अेटलुं लउं .

आ संसारमां तारी समृद्धीना,भंडार भर्या छे बउं.
मुखमां समाशे अेटलुं ज मागीश, नही उंडळमां लउं ,
प्रभु तुं आपे अेटलुं लउं .

मोंघा होय तोय मोती खवाय नही खाय सौ बाजरो ने घउं.
मीलना मालीकथी ताका पे'राय नही, सवा गज पहेरे सौ .
प्रभु तुं आपे अेटलुं लउं .

समदर पीधे प्यास बुझे नही,अपचो थई जाय बउं.
मीठडुं नानुं झरणुं मळे तो अमृत घुंटडा लउं .
प्रभु तुं आपे अेटलुं लउं .

घरना गोखमां प्रभु मळे तो हालुं शीद गाउना गाउ .
*"दाद"* कहे प्रभु तारी दुनियामां तुं राखे अेम रउं .
प्रभु तुं आपे अेटलुं लउं .

रतियता :- कविश्री दाद
टाईप    :- मनुदान गढवी

                वंदे सोनल मातरम्

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