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"जय माताजी मारा आ ब्लॉगमां आपणु स्वागत छे मुलाक़ात बदल आपनो आभार "
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1 सितंबर 2016

कच्छ देशनी अस्मिता...प्रस्तुति कवि चकमक

कच्छ देशनी  अस्मिता...!

कविनी कविता गुप्त सरिता वसे,
सुर दातार भंडार भरणी,
डुंगरे कंदरे अडिखम अस्मिता,
घन्य आ देशनी कच्छ घरणी...

कच्छ देशनी अस्मिता ऐटले संतो, सुफीओ, देव-देवीओ, पीर-पीराणा, शुरवीरो अने दातारोनी वातुं.
नारायण सरोवर, कोटेश्वर अने आई श्री रवेचीना परम प्रागटयथी कच्छ घरा ऐक आगवुं गौरव घरावे छे.
सिंघनुं राज्य सिद्घ नामना चारण कविने बक्षिस आपीने जाम उनडे कच्छमां आवी निवास कयोॅ.
आवा काळे आ देशनी घरतीमां मानव वसवाट अने नगर रचनाओनो अभाव हतो.
अस्तव्यस्त अने भटकती जन जातिओ मुख्यत्वे पशुपालननो व्यवसाय करती. कोई कोई पोठीयाओ अने सांढियाओ पर नाना मोटा वेपारनी वणज करता.
आवी वणजमां हेम हडाउ नामनो चारण मुख्य हतो. घनाढय पण ऐटलो ज हतो. तेनी उदारताऐ तो तेने अमर करी दीघो.
ऐक वखत सोनामहोरोनी पोठो भरीने नीकळतां रस्तामां नदी पार करवा जतां ऐक पोठना बारदनमां काणुं पडवाथी मोतीडानी घार थवा लागी, आ ढोळाता मोतीडाने पाणीमांथी उछळती माछलीओ झीलवा लागी. आवुं अदभूत सुंदर द्रश्य जोईने हेमहडाउऐ पोताना माणसोने कह्युं के आ बघी ज पोठोमां काणा पाडी नाखो आ रुपाळा द्रश्यने मारे पुरु मांणवु छे.
आवो हतो उदार चारण....
ऐटले तो कोईऐ कहयुं छे के...

वातुं रहेशे वीर,
भलायुं तणी भाणना !
पडशे पंड शरीर,
परसत गढ पडशे नहि !!

प्रशस्ती रुपी चणायेला किल्लाओ कोई दिवस पडवाना नथी. जगतमां वातुं ज रहेवानी छे.
लाखा जेहडा लख गया,
उन्नड जेहडा अठ्ठ !
हेमहडाउ हल गया,
किंजी न वींजी वट्ट !!

जय माताजी.

प्रस्तुति कवि चकमक.

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