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24 मई 2017

डंका रे दिधा लंका नी दोढीये - कवि श्री कानाभाइ गढवी(वढीयार)

*डंका रे दिधा लंका नी दोढीये...* 🏹
                     🌞🙏🌞
धरणी रे ध्रुजी,ने आकाश ढंकिया,
बंकडा तारा गर्जना करता बाण रे,
दशरथ ना कुंवर डंका  रे दिधो लंका नी दोढीए...

हल्या मेरु,कैलाश हनुमान नी हाकले
भान भुली ने थोभ्यो,आकाशे भाण रे,
दशरथ ना कुंवर डंका रे.....

शुध्ध क्षत्रियो ना पराक्रम,पूर्ण साचव्या
जशवंता करी लोक,चौद मा जाण रे,
दशरथ ना कुंवर डंका रे.....

खपरो रे भरवा,जोगणीयो खेलती
(ते)रुधीर नी ना पडवा ,दिधी ताण रे,
दशरथ ना कुंवर डंका रे.....

कुंभकर्ण,रावण जेवा ने काप्या
ढाळी दिधा अभीमानी ना ढाळ रे
दशरथ ना कुंवर डंका रे.....

भोजन लेवा मांसना,नाचता भैरवो
विरभद्र जेवा करी रह्या छे वखाण रे,
दशरथ ना कुंवर डंका रे.....

विर ने वेताल, पराक्रम ने वंदता
गढ कोटा उपर ,आशिष देवा गीधाण रे,
दशरथ ना कुंवर डंका रे.....

बंधु छे लक्ष्मण,जेवा नीत संग मा
आप्या जगत ने विर क्षत्रिय ना एलाण रे,
दशरथ ना कुंवर डंका रे.....

कान कवि,अर्पण सुनी ने किर्ती
रंग दे जाजा भूपती,रघुराण रे,
दशरथ ना कुंवर डंका रे.....

~*कवि श्री कानाभाइ गढवी(वढीयार)*
*काठी संस्कृतिदीप संस्थान* ☀
  *सहयोगः* भगवतदान गढवी

*!..क्षत्रिय विर ज्योती*
                    *श्री राम नी जय हो..!*
                🏹🏹🏹
🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩

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