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26 अप्रैल 2018

||रामायण महागाथा भाग 2|| || कर्ता मितेशदान गढवी(सिंहढाय्च) ||

*क्रमशः,,,,*

रामायण महागाथा भाग 1 से क्रमश:,,,

*(कवित)*

पूरब में चले पैर,ज्ञान की लगाव ढ़ेर,
बैठ  तरु नीचे बुद्धध्यान जो लगावे है,
अन्न जल्ल लिए त्याही वर्सो मन त्यों वसाही,
देह सुखी काटा बने ब्रह्म को जगावै है,
नाना कई विघ्न नड़े,लड़े बिना क्रोध जड़े,
तपस्वी सटीक मने,ध्यान ना डगावे है,
प्रथमि अवधि अंत,खाव तृण धरि खंत,
त्याही  त्यों इंद्रा  तुरंत, विप्र बन आवे है,(192)

(ज्योंही प्रथम ग्रास उठाया भी न था कि ब्राह्मण भिक्षुक के रुप में आकर इन्द्र ने भोजन की याचना की। विश्वामित्र ने अपना भोजन उस याचक को दे दिया और स्वयं निराहार रह गये।,,,
“इन्द्र को भोजन दे देने के पश्चात विश्वामित्र के मन में विचार आया कि सम्भवत: अभी मेरे भोजन ग्रहण करने का अवसर नहीं आया है, इसीलिये याचक के रूप में यह विप्र उपस्थित हो गया। मुझे अभी और तपस्या करना चाहिये। अतएव वे मौनव्रत धारण कर फिर से दीर्घकालीन तपस्या में लीन हो गये।)

*छप्पय*
तप जप किन्नो तेज,प्रगट्यो जगमें प्रछुट्यो,
ध्यान श्वास इक धार,तार मंत्रा को न तूट्यो,
दैव चले ब्रह्मलोक,कथन ईण तप को तापन,
सूर्य चंद्र का स्त्रोत,तेज निस्तेज कु लागन,
क्रोध मोह मन ध्यान करि,ब्रम्ह तप्प महा तेज तरे,
श्रेष्ठ ब्राह्मणा पद सु पावन,कठिन घोर ज्यो तप्प करे,(193)

कठोर तप्प वे कीरत,नैण मुख हलचल नाही,
बहुत खगा क्ल बल,जनावर भें कर ज्याहि,
पलक डगा न पावे,कीये न साहस किसमें,
नजिक कदे  नाआवे,जबरडर भरियो  जिसमे,
महा क्रोधी अभीमानवी,ज्यो मन अडग जमाव,
बैठो जप एक चित्त बनी,लगन ब्रह्म लगाव,(194)

*(जब इंद्र को सूचना मिली कि विश्वामित्र फिर से अपने तप्प मे लीन हो गए और इस बार इतने कठिन तप्प में बैठ गए है कि इंद्र को भी मन मे भय बैठ गया तो उसने युक्ति लगाई की उनका तप्प सफल नही होने दूंगा)*

*जाण इंद्र तप जप्प,ऋषि को रोकन लाग्यो,*
*भय में भटक्यो भोर,मन्न चिंतामई    चाग्यो,*
*सकळ विश्व को स्थाप,देवता बन खुद दाता,*
*लाग्यो युकति लगण,तप्प तोड़न को   ताता,*
*ध्वस्त क्रोध को धीर धरि,अहंकारी नह आवसे,*
*सृस्टि महि ए सुरभूप,सफळ कदी नव थावसे,(195)*

*{ मेनका वर्णन }*

स्वर्ग समी अखियात सोहावत,अंग जड़्यु सुरवण सु मोती
चंद समी शीत रात सोहावत,तृण भीनु मुख स्मित पिरोती,
तेग समी अणी धार सोहावत,काटत चित कु मीत सु होती,
मोहित चाह रति सम सोहन जीतन प्रीत से प्राण सजौति,(196)

*(चेहरा)*

ज्यो नभ सुर्य को शिर जड़े,सुर्य साधत प्रौढ़ लगे सुरवाणी,
ज्यो पंक जागत रूप जडे पंक पान समु मलकावत पाणी,
ज्यो तरुवा धर लील जड़े तरु डाल शिखा  सरकावत  ताणी,
त्यों मुख छाप मढ़े रूप जे हर प्रीत यू मीत की चित ले जाणी,(197)

*(आँखे)*

केश कटु निल आँचल कैद,विदे नित प्रेम का वे'ण वछुटे,
मेंश लगे झलके मुख भेद,रिदै जीत मन्न से तार न टूटे,
मोह कजे हथियार मथ्थे,मुख्यांग लगावत   प्रीत मुकुटे,
घेंन सु रेन चढ़ावत है घट,नैण ऐसा *मीत* दर्श नखुटे(198)

(ओष्ठ)

चंदन शीत शु चाहत चित,प्रतीत मुखा पर पामत प्रीतू,
वंदन कीत शब्द सु वित्त,सरित समु वेण सामत रीतु,
राखत बोल समु रव रीत,चरीत की भीत को आप छबीतू,
साजन की सुर जीत समावत,हेत मुले मीत काट हरितू,(199)
*(हरितू-अग्नि)*

*(रूप)*

छाव तरु छब रीत छले,अरु हेत का जाल बिछाव अचंबित,
घाव जरू दल मीत गले,रूप नार मयूरीय नाच रमंकित,
सोल सजी शणगार शुभांगी,कैयिम'धु तन कंठ कमंदिय,
रूप राधिकेय रास रमे तट बंसीय श्याम को मुख बजंतिय,(200)

(शुभांगी-रति का दूसरा नाम)
(केयिम=स्वभाव,
मधु= मीठप,)
(कैयिम'धु=मीठो स्वभाव)
(कमंद- सवैया नी जात नो एक छंद,)

धर पे धर्यो जे ध्यान,ऋषि तप लीन्न हु रच्यो,
नटकंती रूप नार,बणी ऋषि मोह न  बच्यो,
कियो वश्श मन कैद,तप्प को तोड़ दियो तहि,
अंतर उपजण आस,जगायो प्रेम वास जहि,
मर्त्यलोक नारी बणी,भ्रमित कियो ऋषि भेख,
पाडयो आदेश पुरंदरे,दृस्टि दुख जिय देख,(201)

रंगत संगत   रेख, ऋषि अर्धांग रही ते,
प्रेम पंख जिय पेख,बहु मन अंग बही ते
जंखन लागी ज्योत,तेजमय पृथ्वीलोकते,
वृख धरणी विहरोत,भूली गई इंद्र रोकते,
सुख पामी संसारमे,परण ऋषि मन  प्रेम,
मन वस कर के मीतड़ा,हृदय वसी बन हेम,(202)

टूट्यो सर्जन  तप्प,दृढ़ निश्चय नय देख्यो,
जुट्यो लगनी जप्प,भडे सृस्टिय नभेख्यो,
पीतम संगें  प्रेम,लगावण लाग्यो पट लट,
झंख बंधाणी झट्ट,रिदै अप्सरा नाम   रट,
मोह टूट्यो नह मनमे,जुटायो प्रीत जुनून,
सुता जन्म शकुंतला,सुख लिधोय सुकुन,(203)

*(मेनका की इंद्रलोक की  चिंता)*

वह जानती थी कि उसकी अनुपस्थिति में अप्सरा उर्वशी, रम्भा, आदि इन्द्रलोक में आनंद उठा रही होंगी। दिन महीनों में बदलते गए और एक दिन अप्सरा मेनका ने ऋषि विश्वामित्र की संतान को जन्म दिया

ऋषि विश्वामित्र एवं अप्सरा शकुंतला की यह पुत्री आगे चलकर ‘शकुंतला’ के नाम से जानी गई। इसी पुत्री का आगे चलकर सम्राट दुष्यंत से प्रेम विवाह हुआ, जिनसे उन्हें पुत्र के रूप में ‘भरत’ की प्राप्ति हुई। इसी पुत्र के नाम से भारत देश का नाम विख्यात हुआ।

*धनुष यज्ञ आरंभ*

मिथिला नरेश के वहाँ से विदा हो जाने पर ऋषि विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को लेकर यज्ञ मण्डप में गये। यज्ञ मण्डप को अत्यंत सुरुचि के साथ सजाया गया था। उस भव्य मण्डप को देखकर लगता था मानों वह देवराज इन्द्र का दरबार हो।

चले रघुराज धूणीपर   चाह,
स्वयंवर काज मनोहर   साह,
सजावट लाग पुरंदर    सोम,
जमावट ज्योत जगी धरजोम,(204)

प्रजापति राज हुवे   प्रफुलित,
जुवे गुणराज लगे मन   जीत,
धरा सज लागत व्योमेशु धीर,
सभे दिश फौरत  हेम   समीर,(205)

जड़े आभूषण मणि सह जोम,
घड़े  चिरघाट धणी कज घोम,
फरे पताकाय    गढ़े  फरराट,
करे प्रदर्शित उजास  की  वाट,(206)

झमंकित स्तंभ जड़े आभूषण,
पठे वेद पाठत  ब्राह्मण   प्रण,
तठे महा राज बिठे मुछ  तान,
रमणिया झांख झरुखेय  कान,(207)

*(मानों सैकड़ों इन्द्र अपने वैभव और सौन्दर्य का प्रदर्शन करने के लिये महाराज जनक की यज्ञ भूमि में एकत्रित हुये हों। इस सौन्दर्य का अवलोकन करने के लिये जनकपुर की लावण्यमयी रमणियाँ अपने घरों के झरोखों से झाँक रही थीं।)*

गर्जन-तर्जन करते हये पिनाक को इस मनोमुग्धकारी वातावरण में यज्ञ भूमि में लाया गया। सभी की उत्सुक दृष्टि उसी ओर घूम गई। सहस्त्रों व्यक्ति उस धनुष को एक विशाल गाड़ी में धीरे-धीरे खींच रहे थे। उस विशालकाय बज्र के समान धनुष को देखकर बड़े-बड़े बलवानों का धैर्य छूटने लगा और पसीना आने लगा।

*पिनाक दर्शन*

*रमणिंक तेज रथ परे राख,झणकंत प्रकाशीय पड़त झांख,*
*थड वज्र समानं थंभकाय,वरसण प्रति दरश विशाल काय,*(208)

*दीर्घात दृष्टि निरखंत दैव,शिव कर सोह्यो रहयो सदैव*
*मनमोहक छबी रख गण महान,जहरे जब थळकत है जहान*(209)

*जगमगे ज्वाल रूप परम ज्योम,वहै पवन शीत सरसरे व्योम,*
*गरजे गणणन नभ गजत गान,टंकारत टणणन छेद तान,*(210)

**शक्ति अपार धनु शंकराय,धर्मान्त पुर योगंतकाय,*
*त्रिपुरासुर मारण रूप तुर,सर करत सिद्ध  संकीय सुर,*(211)

*नभ गड गड गरजे घोर नाद,थड तळ तळ धर सह कर विवाद,*
*संगम सजियो जड़ सौम्य सार,त्रिभुवन जोवे तरकस तिखार,* (212)

*क्रम रम रम रण झण कीरत कुंड,प्रत्यंचा खींचत लग त्रिपुंड,*
*महा गण रूप शिव दियण मीत,
जहां सद गत धनख उचित जीत*(213)

पिनाक को यथास्थान पर स्थापित कर दिया गया। राजा जनक के ज्येष्ठ पुत्र सीता एवं उनकी सहेलियों को साथ लेकर धनुष के पास आये और बोले, “हे सम्पूर्ण संसार के राजाओं और राजकुमारों! महाराज जनक ने प्रतिज्ञा की है कि जो कोई भी महादेव जी के इस पिनाक नामक धनुष की प्रत्यंचा को चढ़ायेगा उसके साथ मिथिलापति महाराज जनक अपनी राजकुमारी सीता का विवाह कर देंगे।”

यथाचित स्थान रखीय  पिनाक,
कथ्यों नियमांक विवा विषयाक,
महागण आप  सभेय     महान,
प्रति मुनि देव गुणी     यजमान,(214)

पड्यो महादेव तणो ही पिनाक,
चढ़ावत डोर करे जेहि    चाक,
एहि वर योग्य लागे  मन  आज,
तेहि लेव जाव स्वयंवर     ताज,(215)

(राजा जनक की इस प्रतिज्ञा को सुनकर राजा और राजकुमार बारी बारी से उस धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने के लिये आये किन्तु भरपूर प्रयास करके भी उस पर प्रत्यंचा चढ़ाना तो दूर उसे हिला भी न सके। )

उठे एको ईक लगे  बल  आप,
कथे एक दुजेत  बातेय   काप,
छता नय छोड़ उठे धनु   छिन्न,
भमे पड़ता धर  चक्कर   भिन्न,(216)

(अन्त में वे लज्जित हो सिर झुका कर तथा श्रीहीन होकर इस प्रकार अपने-अपने आसनों पर लौट गये जैसे कि नागराज अपनी मणि गवाँकर लौट आते हैं। )

देख्यो नय कोई हुवो बलवान,
धनु पर डोर खिंचे न  चिंधान,
जुवे सब शीश झुकावत जाय,
मनो मन दुख जनक न  माय,(217)

(जब कोई भी राजा धनुष पर प्रत्यंचा नही चढ़ा पाया तो जनकराजा दुःखी हो गए उन्हो ने दुख व्यक्त करते हुए कहा की,,,,)

*(राजा जनक के शब्द )*

मुखे कह राव कहा गयो  बल्ल,
नहीं कोउ तेज सभेय   निठल्ल,
दिखावट खत्रिय वट्ट को   दीप,
गये कहा बल्ल विधा गण तीत,(218)

जईण न ज्योत दिखाव न जाय,
कहीण न वट्ट  खत्रिय न  काय,
धरा पर वीर  तणो  नही     धूर,
भर्यो नही जाणत भेद    भुं रूर,(219)
(जईण-वेगवाळू)

लगे मन्न वर नही कोई   वीर,
सीता रह आतम एकल  थीर,
विवाह समूह  न भाग न वात,
जीभाह जनक कथे  समरात,(220)

( राजा जनक के द्वारा की गई इस भर्त्सना का उनके पास कोई उत्तर न था। परन्तु अयोध्या के छोटे राजकुमार लक्ष्मण को मिथिलापति द्वारा समस्त क्षत्रियों पर लगाया गया लांछन सहन नहीं हुआ। कुपित होकर उन्होंने अपनी भृकुटि चढ़ा ली)

*दोहा*

*जंख वेण जपटावियो,क्षात्रे जनक कट सुर*
*लखमन आगे लागियो,तन लगे तीखा तुर(221)*

ज्यारे जनक सभा मा स्वयंवर वखते वारा फरथी राजाओ धनुष उपाडवा मा निष्फल थता जनक कहे,
*है क्षत्रियो क्या गयु सुरातन,केम आजे शांत बैठी रह्या छो,वट क्या ग्यो,एक धनुष ज उपाडवू छे ए पण नथी उपाडी शकता,आज मने लागे छे मारी सीता माटे मने योग्य वीर नही मली शके,लागे छे जीवन भर एकली ज रहेशे,*

आ सांभड़ता ज लक्ष्मण ना तन मन मा अगन ज्वाल लागी उठी के तमे क्षत्रियो विषे बोलवानी हिम्मत केम करि शक्या,

*अजोधा थीय आविया,रघुकुल नंदन राम*
*धनूष तोड़ी धारसे,(ई)नयन सीता नु नाम(222)*

(राम(क्षत्रिय शान)प्रसस्ति करते हुवे मिथिला नरेश जनक को लक्ष्मण द्वारा दिया गया जवाब)

*{लक्ष्मण संवाद}*

कह कूट नही मन छूट कथे सुण बात कछु काहे बोलत जाही,
जाणत नत कु मस्तक शान व हस्तक खत्रिय वट्ट न पाही,
सूरज वंश कु देख प्रतापिय राम शुरो मुज भ्रात है संगी,
वट्ट नही रजवट्ट का कारण,तारण मीत ये  राम बिरंगी,(223)

काळ बनी मुख जिह रुपे तुव वेण काहे    बन खोलत आचा,
शब्द छुटा कर बोल जबे तब मन्न विचार करे सब साचा,
जो सुमिरे रघुनंदन को कह बात निरालीय है रघुरंगी,
वट्ट नही रजवट्ट का कारण,तारण मीत ये  राम बिरंगी,(224)

बल्ल अचल्ल अड़ाभीड़ दल्ल,अकल्ल एकल्ल जो आथडतो है,
एक निठल्ल न झल्ल झले,खल गल्ल उछल्ल गुणा घडतो है,
घाट थपाट के वाट फरावत है समराट शुरा खतरंगी,
वट्ट नही रजवट्ट के कारण,तारण मीत ये  राम बिरंगी,(225)

(लक्षमण अंत मे ये जनक को कहता है,,,आप शिव के इस पुराने पिनाक की इतनी गरिमा सिद्ध करना चाहते हैं। मैं बिना किसी अभिमान के कह सकता हूँ कि इस पुराने धनुष की तो बात ही क्या है, यदि मैं चाहूँ तो अपनी भुजाओं के बल से इस धनुष के स्वामी महादेव सहित सम्पूर्ण सुमेरु पर्वत को हिला कर रख दूँ। इस विशाल पृथ्वी को अभी इसी समय रसातल में पहुँचा दूँ।”)

काहे प्रसंसिय बात किंनों इण काट लगे धनु तोडन बाके,
जो मुज ध्यान धरे बाहुबल सुमेरु गिरी हिल जावत हाके,
धक्क लगावु अळा पर तो सह भोम दबावू सभे धड़भंगी,
वट्ट नही रजवट्ट के कारण,तारण मीत ये  राम बिरंगी,(226)

*(ऐसा कहते हुवे लक्षमण के नेत्र क्रोध से लाल हो गये, उनकी भुजाएँ फड़कने लगीं और उनका सम्पूर्ण शरीर क्रोध की ज्वाला के कारण थर थर काँपने लगा।)*

{【राम द्वारा धनुष भंग】}

लक्ष्मण को अत्यन्त क्रुद्ध एवं आवेश में देख कर राम ने संकेत से उन्हें अपने स्थान पर बैठ जाने का निर्देश दिया और गुरु विश्वामित्र की ओर देखने लगे मानो पूछ रहे हों के वर्तमान परिस्थिति में मुझे क्या करना चाहिये। विश्वामित्र ने कहा, “वत्स! लक्ष्मण ने सूर्यकुल की जिस मर्यादा एवं गौरव वर्णन किया है वह सत्य है। अब तुम धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर लक्ष्मण के वचन को सिद्ध कर के दिखाओ।”

*मितेशदान(सिंहढाय्च)  कृत  रामायण महागाथा मांथी,,,,*

*||रचना:धनुषभंग प्रसंग||*
*||कर्ता: मितेशदान महेशदान गढ़वी(सिंहढाय्च)||*
*||छंद दुर्मिळा||*

जमरोळ हला बळ बात जिन्हों धमरोळ लियो मन वाक धरी,
मिथिलेश उवाचेय आप महजुद्ध देखण लख्खन कोप दरी,
समताप कियो नरपत्त सजोगिय ध्रुजट्ट आभ चड़ी वकर्यो,
कळळळ धरा नभ धाक मची जब राघव हाथ धनुष धर्यो, (227)

ध्रुजताक धरा मेरु पंड धुरंदल,स्पर्शन तीर गढ़े सुरताक,
व्रहैमंड  खंड तणो खींच खाटत,पाण पणंछत नाखत पाक,
रसातल व्योम थडक्कीय राजत,कंड  मरोड़ त्रिपुंड कर्यो,
कळळळ धरा नभ धाक मची जब राघव हाथ धनुष धर्यो,(228)

द्रग देव सभे निज मन्न भु दख्खण,खख्खण घुघरी झांझ कणी,
कद गज गढ्यो शिव हाथ धनु,लेहु जोर जमोड के कांध खणी,
अंत ड़ोर तणो लिये आंट के अक्कड़,पक्कड़ तोड़ पणंछ पर्यो,
कळळळ धरा नभ धाक मची जब राघव हाथ धनुष धर्यो,(229)

झंपझोर  लगो तूटके तरळाट,मच्यो घुघवाटण घोर भवा,
अह्रीमान अचंबित देव भये,चकचूर विलंबित मुग्ध चवा,
भरपूर मही भूप उर फुले,जय हो मीत राम को नाद भर्यो,
कळळळ धरा नभ धाक मची जब राघव हाथ धनुष धर्यो,(230)

सुरजागत थंभ सु रथ्थ रणे नभ,रभ्भ सुरम्भण वारण है,
कर लंब छटा धर नभ्भ पटाधर तेज व्रहा दरशावण है,
जुग जोवत है इतिहास समो एक राम तणो तद नाम खर्यो,
कळळळ धरा नभ धाक मची जब राघव हाथ धनुष धर्यो,(231)

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