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2 जनवरी 2019

मढडा संमेलन प्रथम दिवस सं-2010 अक्षय तृतीया वैशाख सुद-3 बुधवार ता.05-05-54 ना रोज आई मां नुं मंगळ प्रवचन

*मढडा संमेलन प्रथम दिवस सं-2010 अक्षय तृतीया वैशाख सुद-3 बुधवार ता.05-05-54 ना रोज आई मां नुं मंगळ प्रवचन*

    " आज अमारा अहोभाग्य के ज्ञाति गंगाना दर्शन थया. घणा दिवस नी ईच्छा हती ते आजे पूरी थई. तमे सौ तकलीफ वेठीने अहीं पधार्या, ते माटे तमारो सौनो आभार मानुं छुं. हुं अभण छुं. अने भाषण करतां आवडतुं नथी, ऐटले मारी वाणी मां कंई भूल थाय तो माफ करजो" आम कहीने आछु हस्या अने फरीने गंभीरताथी बोल्या.
    " जगत जननीनो आशीवार्द छे के चारणोनी हवे चडती थवानी छे, तेनी सौ खात्री राखे. आटली मोटी संख्यामां भेळा थया छो, ते ज्ञाति तरफना प्रेमने लईने ज ने ! *अने ज्यां आटलां बधा माणस प्रेमथी भेळा मळे, त्यां जरूर सारू ज परिणाम आवे.* तमे सौ ऐवा ठराव घडजो के जेथी ज्ञाति आगळ वधे"
   *"आगळना जमाना मां चारणो देव कहेवाता. देव ऐटले ? जेना मां दैवी शकित होय, सत्त्वगुण होय, शुद्ध आचार होय, भजन पूजन होय, ते देव. जेनामां शुभ लक्षण होय तेनुं नाम चारण "*
   " आपणामां नव लाख लोबडियाळीउ थईउ छे. ऐमना पथरा पूजाय छे. तो जीवतीऊं केम न पूजाय ? आपणे देवपण साचवीऐ तो आज पण आपणी बेनुं दिकरीउ जगदंबाउ बने. जगदंबा ऐटले ? जे विषयने आधीन न थाय ई जगदंबा ने जे विषयमां लपटाय ऐनुं नाम स्त्री."
   *" आपणे देव हता. पण अत्यारे आपणामां खोटां लक्षण आवी गयां छे, ते काढी नाखवा जोईऐ. माताजीनुं भजन स्मरण करवुं जोईऐ. गीता, रामायण, हरिरस भणवां विचारवां जोईऐ. कोई बेनुं दिकरीऊं मांगे नहि. भाई मांगवा शीख्या, तेनो चेप बेनु ने पण लागी गयो. ते बंध थावुं जोईऐ. कन्याना पैसा लेवानुं पण बंध करवु जोईऐ अने सौऐ पुरुषार्थ करवो जोईऐ. पुरूषार्थ विना आपणो उद्धार थवानो नथी. पुरूषार्थ ऐटले ज परचो. पुरूषार्थ ऐटले ज देव."*
     " बधा आश्रमो गृहस्थाश्रमने आधारे छे, ऐटले गृहस्थाश्रमने दुध जेवो मानेल छे. दूध थी जेम बधानुं पोषण थाय, ऐम गृहस्थाश्रमथी सौनुं पोषण थाय छे. *पण दूध मां जो मीठुं पडी जाय तो ? तो तेने वाड मां नाखी देवु पडे. माटे गृहस्थाश्रमने पवित्र राखवो.* ऐ बाबत मा शंकरदानजीनी ऐक कविता छे ते हुं बोलुं छुं."
         *.छंद हरि गीत.*
"संसारमां सुख पामवा, कंगालनुं दुःख कापवुं,

याचक अतिथिने यथा शक्ति, दान अन्न नुं आपवुं ;
परणी तिया  पर प्रेम राखी, उच्च करणी आदरी,
भवदधि तरवा भावथी, हरदम समरवा हर हरि... 1

उत्तम विचारोथी निरंतर, शुद्ध अंतर राखवुं,

बदकर्म थी डरवुं बहु, सतकर्म ना सेवक थवुं ;
राखी सु रीती नेक नीति, सत्य बाबत नी समज,
भजवा अजर अज अमर ऐवा, वृषभधव्ज कां गरुडधव्ज...2

निज सुख स्वारथ साधवा, दु:ख दीन ने देवुं नही,

लाखो मळे पण लोभवश, अन्याय थी लेवुं नही ;
काळे करी धन त्रिया काया, त्यागवा पडसे तदन,
(तो) समरवा सुख सदन ऐ, मर्दनमयन कां मधुसुदन....3

ऐवो वखत आवे कदी, अन्न होय ऐकज टंक नुं,

(तो) आपे करो उपवास पण, राजी करो मन रंक नुं ;
ऐवी अजायब मजा लेवा, विरर्दढ राखी वृति,
क्षण क्षण प्रति संभारवा, गिरिजापती का श्रीपति....4

नरनाथ ने घरनाथ ने, जरनाथ सर्वे जाणजो,

सद वखतमा सत्यकर्म करजो, अहंकार न आणजो ;
परहित करो कीर्ति वरो, मृतलोकमां लेवा मजो,
*'शंकर'* कवि नीति सजो, दुर्मद तजो, ईश्वर भजो..." 5

   आम कही पू. आई मां ऐ बे हाथ जोड्या, ने मस्तक नामाव्यू, जे सामे वीस हजार हाथ भेळा थया. दश हजार मस्तक नमी पड्यां. ' सोनल मात की जय ' नो घोष गर्जी उठ्यो.
टाईप :- www.charanisahity.in
संदर्भ :- पिंगळशीभाई पायक रचित मातृदर्शन मांथी पाना नंबर 377 अने 378 पर थी
टाईप मां भूलचूक होय तो सुधारी ने वांचवा विनंती छे
*ख़ास नोंध :- आ खाली जाणकारी माटे ज मातृदर्शन मांथी टाईप करेल छे क्यां पण Copyright नो भंग थयेल होय तो माफ़ करजो*
*Forward To All Friends & Groups*
     * वंदे सोनल मातरम् *

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