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13 फ़रवरी 2016

भगतबापु नी एक रचना

............जय माताजी ..............
{ हरण दु:ख हरजोगरी )
( दुहो )
पाप भर्यो गरवापति , कह्युं न मान्यो केण ,
देवी दुभाते दिले , वदती नागई वेण ,
             || छंद सारसी ||
मनखोट  महिपत मेल माजा , अम धरां पर आवियो ,
रजवट तणी नहि रीत राजा , लाव लश्कर लावियो ,
हुं भीन भा तुं पुण्य पाजा , धरण कां अवळी फरी .
नकळंग अशरण शरण नागई , हरण दु:ख हरजोगरी .
जीय हरण दु:ख हरजोगरी ....टेक (1)
कळरुप ध्राप्यों नहिं कटकें , धरापत गरवा धणी ,
लांघण्यो सावज केम लटके , भरख करवा तृण भणी ,
दळ अकळ मोकळ - दक्षिण अणां पति ! जो विचारी मन जरी .
नकळंग अशरण शरण नागई , हरण दु:ख हरजोगरी , (2)
दशकंध रा मन हाल देख्ये , विठले वृंदा चळी ,
भड भोग भूपत नो भूंडा , हवे मा तणे शर मांडळी ! ,
वळ बाप पाछो ताप त्यागी , पाप मन नु परहरी
नकळंग अशरण शरण नागई , हरण दु:ख हरजोगरी , (3)
कर खडग मंडळिक बोल कफरा , वचन धक अवळी वळी  ,
अण समय बुढ्ढी तणे अंगे , कोप जवाळा परजळी ,
वैराट रुपे घाट वधिओ , आंट भांजण मद अरि
नकळंग अशरण शरण नागई , हरण दु:ख हरजोगरी , (4)
महिमाय अेतक नाट मांडयो , पाट जूनो पलटवा ,
खेचरी अवळो हाथ खोल्यो , थाट अधरम थंभवा ,
वैरी धरां पर डाट वाळण , अण वखतरी आकरी ,
नकळंग अशरण शरण नागई , हरण दु:ख हरजोगरी , (5)
असराण सोरठ परे अणगळ , हेमरां दळ हालशे ,
कलबाण जूने हुकळ कर , महमदशानां मालशे ,
रघुवीर मंदिर जीयां राजत , पीर तकिया परवरी ,
नकळंग अशरण शरण नागई , हरण दु:ख हरजोगरी , (6)
खट मासमां खत्रिआणीओनी , सधट ओझल छूटशे ,
अरि विकट उपरकोट आखो , 'ला' अला कही लूंटशे ,
पकडाईश तुं हतभाग्य पापी , दाढियोथी मन डरी ,
नकळंग अशरण शरण नागई , हरण दु:ख हरजोगरी , (7)
भूकंप लाग्यो तदि भेंकार , धूंखळे गरो धह्यो ,
सुख दिहण शरणां 'काग' सेवत, दैत्य भूपतने दह्यो ,
हाली हिमाळा उपरे , 'हुं' देव मटी डाकण ठरी ,
नकळंग अशरण शरण नागई , हरण दु:ख हरजोगरी , (8)
 
रचयता :-  भगतबापु
टाईप :-    मनुदान गढवी - महुवा.
        वंदे सोनल मातरम्

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