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10 मार्च 2016

कविश्री कागबापु नी रचना

**॥ माता तारो प्रताप ॥**
माता तारो ऐ प्रताप जी
तारो ऐ प्रताप, वनमां विगत लीधी सात-माता ! टेक
पिताजी ने काने पडी ज्यां, (मारी) वन जवानी वातजी (2);
पुत्रवियोगे प्राण तजीया (2), मळजो ऐवा तात-माता ! 1.
तजी नारी तजी निद्रा, तज्यां मात ने तात जी (2);
लंकाना रणमां जीव तजीयो (2), मळजो लखमण भ्रात-माता 2.
भाइ विनानो वैभव मळता, तनमां सळग्यो ताप जी (2);
भरत केरो प्रेम भरतां (2), खुट्यां कविनां माप-माता ! 3.
क्यांनो हुं अने वानर क्यांना, धडीकनो मेळाप जी (2);
कपिऐ आखा कुळने होम्युं (2), जपी मरणनां जाप-माता 4.
कुंभकरणने रावण जोधा, जेनां जोम अमाप जी (2);
ऐना बळनुं माप मळीयुं (2), मम भुजाबळ माप-माता ! 5.
मारा मनडाकेरी मूर्ति, सीतानो हरण संताप जी (2);
'काग' के' हनुमान मळीयो, सेवक टाळण ताप-माता ! 6.
रचना:- चारण कवि श्री दुला भाया काग (भगतबापु).
टाईप:- लाभुभाइ गढवी.
मोबाईल नंबर:- 9737406939.

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