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28 जून 2016

कहे न साचुं कोई रचना: जोगीदान गढवी (चडीया)

.          || कहे न साचुं कोई ||
.   *रचना: जोगीदान गढवी (चडीया)*
आतम आ अकळाय छे, जोगी चडीया जोई
सारी वातुं सौ करे पण, कहे न साचुं कोई
दुखीयारी कोई दीकरी, रह रह आंहूं रोई
जळीन मरती जोगडा, कहे न साचुं कोई
नात्य अमारी नवलखी, हीये हरख शुं होय
जुठ  पाखंडी  जोगडा, कहे न साचु कोय
आयुं कही उपासवी,पाछी, दूभवे वातुं दोय
जरी न गोठे जोगडा,पण, कहे न साचुं कोय
कठण कलेजा कारमां, ई, नात अमांणी नोय
जाय बळी घट जोगडा,तोय, कहेन साचुं कोय
हुंज वडो ई होड मां, खुद ध्रम बेठा खोय
जाळव पाछो जोगडा, कहे न साचुं कोय.
सरग नरग संसार मां, देखल  वातुं दोई
जगत पिता विण जोगडा, कहे न साचुं कोई.
पातक रोंगा पिरहता, ध्रमने नामे धोई
जग वेपारी जोगडा, कहे न साचुं कोई.
मात पिता बंधु मलक, फुवा कहो के फोई
जुट्ठो सब जग जोगडा, कहे न साचु कोई.
मुवा लगण माया मळे, रहेता पाछळ रोई
जीवन सगां सउ जोगडा, कहे साचु कोई.
माटी वाहण मानवी, हेम हरी रट होई
जग आखा ने जोगडा, कहे न साचु कोई.
आघारीत अनुमान नी, जगमां वातुं जोई
जीव उद्धारक जोगडा, कहे न साचु कोई.
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