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5 जुलाई 2016

कवि श्री दुला भाया काग बापु नी कलमे रुतुवर्णन

कवि श्री दुला भाया काग बापु नी कलमे रुतुवर्णन

(  दोहा)

धर हरियो  कंचवो धर्यो,  माथे श्याम मलीर;
चमकी  बीज  अशाढीरी,   गहके  मोर  गीर.,.,१

रींछडियुं  रमवा   चडी,  नदी नाळां छलकंत;
पहाड  अधोले  आढियु,  मेखडियुं   मलकंत.,.,२

इंद्रधनुष ताण्यां अकळ,   गडहड अंबर गाज;
शादुळे  शर   प्राछटयां,   वाज सुणी वनराज,.,.३

(छंद- सारसी)

आषाढ घमघम धरा धमधम, वरळ  चमचम वीजळी,.
           जीय  वरळ  चमचम वीजळी,.,

गडहडिय  सज दळ, आभा वळकळ, मंद प्रबळा मलकती,
दीपती  खड खड,  हसी  नवढा,  श्याम   घुंघट   छुपती;
अबळा   अकेली,   करत  केली,   व्योम  वेली  लळवळी,
                आषाढ घमघम धरा धमधम.,.,१

मद  भरी  व्रळकी,  मेल माजा,  ग‍गन   तळ  सळगी  गियां,
जळ भर्यो वादळ, चडयां  अणगण, वरुण दळ वीफरी गियां;
पहाडां  सिखर  पर   दिहण   प्राछट,  सघळ  सेना  हुकळी,
                    आषाढ  घमघम धरा धमधम,

सांकळां  भांगी,  मोर  घनदळ,  ग‍गन नीरखी  गेकिया,
मळरात काळी,  कठ‍ठ  माजम ,  पियु टौक्या बापिया;
सुणि  भणक  काने, कंथ  शोधण, नमी  धर पर नरमळी,
                     आषाढ  घम घम धरा धमधम.,.,३

वादळां कळा,  जुओ  व्रेमंड,  सामसामां  आफळे,
हमसमे सागर,  लोढ हड हड , गगन सुन नोबत गडे
वेरण्या  काळा,  वरा  धर  पर, वाळ छूटा  वादळी,
                     आषाढ  घम घम धरा धमधम.,.,३

खेंचिया   ईदर- धनख  खुल्लां,   सप्तरंगी     शोभियां;
काना  विजोगी  राधीकानां,  हरण जीं  फ‍फडयां  हियां;
पचरंग   पाने,  "काग" पेखी,  फूलडे    गरवर   फळी,.,   

आषाढ  घम घम धरा धमधम.,,५
             
                   ( छप्पय )

       व्रळकी    व्योमे वीज , लजण   लडहडती   लाडी,
       डरती  डरती  दकाळ, अकळ  फरती  धन  आडी;
        मदछद हाकल  मेघ ,   करे  अण  वखत  कडाका,
         ऊधे    माथे    अछत,  धरा  पर   लेत   धडाका;

अवकाश  सफळ  रुध्यो अरक,  चडियां  दळ पवनां  सळी;
आकाशे  सगळ  उठी,  ईद्र  मशालु  उजली

कवि श्री दुला भाया काग {भगतबापु}

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