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17 जुलाई 2016

कर्म - रचना वरदान गढवी

कर्म

            [    छंद :- मनहर   ]

थका कडाका मेघना, चमकती विजळीओ,
मेघराजा खुश थई मनथी वरस्या छे.

पादरे गामना नामे, सुंदर तळाव अहीं,
मेघ महेरे ते खुब आज छलकाणो छे.

तळाव तीरे वडलो,जोगी जेम जटा खोली,
पशु पंखी सौ सजीवो ने आसरो आप्यो छे.

रहेतुं त्या ऐक नेक,प्रेमी चकली नु जोडु,
बांधी माळो संगे ईंडा बे सुंदर आप्या छे.

मळता सुवास जागी,भुडीं भुजंगनी भुख,
वडला नी डाळ बाजु सरकी ने चाल्यो छे.

जीभ लबलबती ऐ,काळ जोई चकली ऐ,
चीस ऐक नाखीने, भुजंग ने रोक्यो छे.

थोभी जाजे काळमुखा,वधतोना आगळ जो,
वात सांभळ कही,चकली ऐ रोक्यो छे.

याद कर ओ नादान,गरुड आव्यो तो दरे,
अवाज अमे करीने तने जगाड्यो छे.

बचाव्याता बच्चा तारा,तने पण बचाव्यो तो,
आज तारी भुंडी भुख पाछड भुल्यो छे.

सांभळी चकी ना बोल,थोभ्यो ऐ भुजंग त्यां,
करी याद भुतकाळ , पाछळ सरक्यो छे.

हा,कलबलाट करी, अमारो जीव बचाव्यो,
चेताव्यो ऐ गरुड , याद भुजंग करे छे.

माफ करजे ओ चकी, भुलमे आज जे करी,
क्षमा मांगी करी ऐ भुजंग पाछो फर्यो छे.

कहे 'दान' सुणो आज,नथी थयो चमत्कार,
हतु वावेलु सारु ते , कर्म आज उग्यो छे..

                               :- वरदान गढवी
                               (8758323886)

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