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20 जुलाई 2016

अहोनिश बजे छे अंतरे नकळंक, नाद गुरू नो - जयेशदान गढवी।

।।अहोनिश बजे छे अंतरे नकळंक, नाद गुरू नो।।

*अहोनिश बजे छे अंतरे नकळंक, नाद गुरू नो।
जगावे घोर निद्रा थी ते सरवो, साद गुरू नो।

* चल छोड ऐ मनवा आ दुनिया गुलाम छे सघळी।
  जो सामे रह्युं वरताइ मुल्क, आबाद गुरू नो।

* पुर्वे लइने आवयो ने अहीं थी लइ जवानो हुं।
  छुटशे दुनिया तोय साथे प्रेमाळ, प्रसाद गुरू नो।

* जुदे जुदे जनमे धर्यो देह जुदा अंश थी।
अनंत जन्मे पण आ आत्मा, औलाद गुरु नो।

* न होय कर्ण के रसणा,
  न होय शब्द के स्मृति।
  बधुं मौन होतां पण संभळाय, शब्द गुरु नो।

*हजारो ग्रंथ ना पाना गळे छे काळ नी गर्ता।
  भवोभव तारवा काफी छे संकेत, एकाद गुरू नो।

* गत जन्म ना भुल्यो आना पण जवाशे भुली।
"जय" रहेशे जन्मोजन्म संबंध, याद गुरू नो।

::::: सदगुरू देव आइ श्री गंगामा ना चरणों मा अर्पित:::

कविः "जय"।
- जयेशदान गढवी।

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