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21 अगस्त 2016

कुंडलिया 《 कविश्री मावलजी दुलॅभरामजी वरसडा// मोरारदान सुरताणीया 》

सुप्रभात जय माताजी🌹👏👏👏🌹
(राजनीति नाम के ग्रंथ के रचयिता मुधॅन्य विद्वान श्री जसुरामजी
वरसडा के पुत्र दुलॅभरामजी और दुलॅभराम जी के पुत्र मावल जी
भी उच्चकोटि के कवि थे मावलजी वरसडा की काव्य वानगी
प्रस्तुत है //मोरारदान सुरताणीया )

                           ☆   कुंडलिया
जियरा जालिम अमल में, करत जुलम के काम,
दया धरम कयों बिसयोॅ, धरत लोभ इतमाम
धरत लोभ इतमाम ,दामका साच संभारे
जब आवे जमराज, हुकम हरमत सब हारे
कहे "मावल "करजोर, सुमिर दिलवर को सियरा,
खरा राम का ख्याल, जालिम तुं मत हो जियरा....१
जियरा बिकट दुआरमें, कयों भुलो भरमाय,
काल पाश की झपट में, तोसों भग्यो न जाय,
तोसें भग्यो न जाय,  प्यासे नह पानि मिलेगो,
संग भाइको छोर , अकेलो आप चलेगो,
कहे "मावल "करजोर दुनी तो जैसे दियरा,
पवन सुं बुझ जाय , जान तुं ऐसा जियरा....२
राजा रावन उठ चले, चले शाह सुलतान
रुम पातशा चल गये ,पलमें कियो प्रयान,
पलमें कियो प्रयान, सान सुरन की कहिये,
मतवारे गजराज, बाजी को पार न लहिये,
कह "मावल "कविराय ,चले सब छोड समाजा
शुर धीर चल गये, गये चल रावन राजा...३
《 कविश्री मावलजी दुलॅभरामजी वरसडा//
मोरारदान सुरताणीया 》

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