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10 सितंबर 2016

।। जीवन नो अधिकार ।।

।। जीवन नो अधिकार ।।

* जगत सामे जो बाथ भरे , तो जीवन नो अधिकार तने।
तारी भुजाए तुं जो तरे , तो जीवन नो अधिकार तने।

* कोइ नथी अहिंया तने शीळी छांया देनारूं।
स्वंयं ताप सहे कां छत्र धरे , तो जीवन नो अधिकार तने।

*  भोग दलदल मा खुंपेला ने, नथी किनारो नथी मझधार
त्यागी थइ जो तुं निसरे , तो जीवन नो अधिकार तने।

* बाह्य दृष्टि सुखने माटे, छे तृषा ऐ मृगजळ नी।
अमी झरणा शोधी ले भीतरे , तो जीवन नो अधिकार तने।

* सौ जाता निज निज ने मार्ग, आपणे साथी क्यां शोधवा?
अगम पथ पर ऐकलो संचरे , तो जीवन नो अधिकार तने।

* छबछबीया ना दाव  सहेला, मोती नी न आश जरिये।
ऊंडा नीर मा जो ऊतरे , तो जीवन नो अधिकार तने।

* छे कोने अहिंया समय ने रूचि, विफळगाथा सांभळवा।
"जय"नाद ने जो उच्चरे , तो जीवन नो अधिकार तने।

* * * * * * * * * * * * *
- कवि: जय।
- जयेशदान गढवी।

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