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10 सितंबर 2016

ऐरे गंग मात (गंगा मया नु कवित ) रचयिता : राजकवि पिंगलशीभाई पातभाई नरेला. भावनगर

ऐरे  गंग  मात (गंगा  मया नु  कवित )

रचयिता : राजकवि  पिंगलशीभाई  पातभाई  नरेला.  भावनगर

                      ॥ कवित ॥

अमृत  की   ल्हेरी   मन   महेरी   हुलास   वारी ,

अनुकंपा  गेहरीमें  सेवक  सुधार  ले,

मुक्तिकी  दाता  जगतमाता  हो  विख्यात  आप ,

चरन  सुख  साता  नर  सिंधु  जल  तार  ले ,

हरकी  सनेहा  तुं  हरि  देहा  रुपधारी ,

बालककुं  प्रतिपाल  कालसे उगार ले ,

तुही  हो  बड़ासे  बडी, देखले  बडाई  तेरी ,

ऐरे    गंग    मात ,  मेरी    सवेरी    संभाळ  ले......1

करुनाकर   सृष्टिमें   दीपत  साक्षात   देवी ,

चाहे   गतीबो  जील  उदक  जटपट  रे ,

किरत  बनाव  चाहे  कर  रे  बनारसिकी ,

करी  सेवा  भवको  दुर्गम  पंथ  कट रे ,

आदि  अंत  मधय   मात  अधम  ओधारनी  हे ,

हाजर  रे  सुकृतकर    दुकृतसे  डर   रे ,

बेठ  ऊठ  चालनमें   मनमें  अखंड  नाम ,

ऐक   टेक  गंग   गंग   रसनामें  रट  रे.........2

आनंद   सुमेरु   हुते   प्रगटी   हजार  धारा ,

सातरूप  सातरूपी  वेदमें  बखानी  हे,

निर्मल  नवखंडन में  किल्लोलि  ब्रह्मनंडन  में ,

वहेती  अखंड  वेग  सुभर   भरानी   हे ,

लखी   नाग   मंडळ  में   ब्रह्मके   कमंडल  में ,

जहां   जैसी   मानी   तहां   तैसी   दरसानी  हे,

पानी  को   परस   होत  पुनर्भव   भटके   ना ,

पानीमें     प्रभुताई      प्रगट      निशानी     हे.......3

साची  जुग  जननी  ते  काशीमें  निवास  कीनो ,

सदा  सुख  राशी  ते  उदासी  मिटे  मनकी,

पापकी  विनाशी  आप  प्रकाशी  प्रताप  तेज,

परसे   प्रवासी  तो  उजासी  होत  तनकी ,

नाथ   कैलासी  विश्व  शिरसी  विलासी  नीर,

तब  जासी  चोरासीकी  फांसी  निज  जनकी,

गंगा   गुन  गासी  तब   थासी  नर  पासी  सुख ,

देवी   अविनासी    ऐक    आसी     दरशनकी..........4

संकलन:  अनिरुद्ध जे. नरेला.  भावनगर

जय माताजी.. जय गंगे मैया नी🌹🌹🙏🙏

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