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30 नवंबर 2016

।। जाग हवे तुं, जाग रे जोगी।। - कवि : जय - जयेशदान गढवी।

( आत्मा जोगी छे, मन भोगी छे।  ज्यारे आत्मभाव जाग्रत थाय छे, त्यारे निज ना साचा स्वरूप नी ओञख थाय छे।  ऐवा निजतत्व ने जाग्रत करवा  आह्वान करतु काव्य......)

।।  *जाग हवे तुं, जाग रे जोगी*।।

जाग हवे तुं, जाग रे जोगी.......
तन नी व्हाली आञस छोडी, मन नी मांह्यली ममता तोडी।
गाइ ले अलख राग रे जोगी।
जाग हवे तुं, जाग रे जोगी.......

* क्यां सुधी फांफा, क्यां सुधी फांका ।
जनम राज नो,  लखणे  रांका।
हञवी हाल्युं तने न सोहे, दोट मेली ने भाग रे जोगी।
जाग हवे तुं, जाग रे जोगी.......(1)

* खंजवाञी ने जखम खोतरे।
आनंद नामे पीड़ा नोतरे।
खंधा धंधा मेल ने पडता, तारे मारग लाग रे जोगी।
जाग हवे तुं, जाग रे जोगी.......(2)

* पञ एक नी नहीं आश सांस नी।
बञते जंगल कुटिया घास नी ।
काजञ कोटडी जोजे न लागे, धोञे अंचञे दाग रे जोगी।
जाग हवे तुं, जाग रे जोगी.......(3)

* पराइ पंचाते खुद ने खोयुं ।
मन ना वमञे मन ने मोयुं ।
मन मर्कट छे बंधन कारण, ऐना न होय चाग रे जोगी।
जाग हवे तुं, जाग रे जोगी.......(4)

* तरवा मरवा नी मेल त्रूष्णा।
धुबाको कर जपती रषणा ।
*जय* घट भीतर उछञे मोजा, आनंद प्रेम अताग रे जोगी।
जाग हवे तुं, जाग रे जोगी.......(5)

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-कवि : *जय*।
- जयेशदान गढवी।

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