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4 मई 2017

धन धन सोनल आइ रचना -- राणसी गढवी

चारणी जोगमाया भगवती आइ सोनबाइ माताजी नी अत्यंत जुनी वंदना जेना शब्दो कच्छी तथा गुजराती मां मिक्ष छे....

धन धन सोनल आई,आंजे पुरवे पूरव जी कमाई..,
देवी ! धन धन सोनल आइ.....
सहाकाळ रुप धर्यो आई सोनल,मढडे में मोमाइ..,
चारण कुळ ने तारवा काजे,मढडे जनम्या आई..,
देवी ! धन धन सोनल आई...
सवंत ओगणीस वरस एंसी, एँसीए हूइ वधाइ....
पिता हमीर ने माताजी राणबाइ,आइ तारा हेते हालर गाइ,
देवी ! धन धन सोनल आइ....
सवंत वीसों ने दसमी साल,
आइ दशइं देवी कहेवाइ..,
वैशाख सुद तृतीया ना दिवसे,माडी अकळ कला दर्शाइ..,
देवी ! धन धन सोनल आइ....
चार उपदेश आइ चारणो ने आप्या,सत्य विषे समजाइ..,
कन्या विक्र ने भिक्षा व्रुति,दिधा दारु मांस छोडाई..,
देवी ! धन धन सोनल आई....
गुणला तारा चारणो गावे,तारे शरणे शिश जुकाइ..,
महेर करोने माडी हमपर, आई तारा "राणसी" जस गाइ..,
देवी ! धन धन सोनल आई...
 *रचना -- राणसी गढवी* 
 *टाइपिंग -- राम बी गढवी* 
*नवीनाळ- कच्छ*
*फोन न. 7383523606*
 *वंदे सोनल मातरमं* 

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