*|| रचना:मायाजाळ ||*
*|| कवित ||*
*||कर्ता: मितेशदान महेशदान गढ़वी(सिंहढाय्च)||*
*ये संसार,इस पूरे पृथ्वी लोक,इस ब्रह्मांड में ऐसी मे एक अद्भुत शक्ति है,ऐसी कुछ माया है जिसे हम जान सकते है, लेकिन देख नै सकते है,और क्या होता है,कैसे होता है,क्यों होता है,जीव कहा से आता है,आत्मा क्या है ये सब भी एक माया ही है,जिसे हम चमत्कार या एक इक्तिफाक समझते है,लेकिन ये सब कर्म धर्म हमारा पहले से ही नक्की होता है,सिर्फ हर जन्म में हमारा देह यानी की शरीर ही नया होता है,ईस विषय मे एक कवित पेश कर रहा हु*
मान का सम्मान जहा नया कही नाम कहा,
जहा हुवे प्रीति कहा वो भी एक माया है,
यार का दीदार जहा देव किरतार वहा,
सहाय बणेय ऐसा मानवी भी माया है,
जाळ कुळ द्वार से जो सत को संभाल ले वो,
तोय कहे कैसी देखो माया का वो साया है,
लहुका है लाल रंग भरा कैसे अंग अंग,
कुदरत की देखो मीत कैसी ये भी माया है,(१)
ब्रह्मा नारायणा शिव आविया त्रि लोक माही,
प्रगट्टा हुवेय सारा ब्रह्मांड रचाया है,
जल थर धरा बनी बीच है अगन ज्वाल,
थर पे बनाया थर मिट्टी को ठेलाया है,
पलमें झुकावे लोक पलमें डगावे धरा,
पलमें पाताल जैसा शेष कोई साया है,
रवि का प्रकाश तेज शीतल शशी का हेम,
कुदरत की देखो मीत कैसी ये भी माया है,(२)
जीव जंतु आया कैसे प्रकृति में प्राण कैसे,
फूलो में सौरभ इण धरा में उपाया है,
हेम का बहाव बड़ा वायु का वहाव कैसे,
ज्वालामुखीओ में कैसे ज्वाला को जगाया है,
मानवी का जीव कैसे उड़ता पंखीय कैसे,
तैरती मछलियां भी माया का ही साया है,
पेड़ में है प्राण कैसे निर्जीव में जान कैसे,
कुदरत की देखो मीत कैसी ये भी माया है,(३)
मद लोभ मोहमाया,संसार का सुख पाया,
कुळ के सहारे कही सत्य भी सवाया है,
मन की सूजे वो करे,कभी कुछ ना भी करे,
भरे भोग कर्म के आधार पे ही खाया है,
जो हुवा है हो गया है,होनेवाला जो भी है,
दिव्यता तो देखो कैसा शक्तिओ का साया है,
चला है संसार युही नयी सिर्फ देह काया,
कुदरत की देखो मीत कैसी ये भी माया है(४)
*🙏----मितेशदान(सिंहढाय्च)----🙏*
*कवि मीत*
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें