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21 नवंबर 2015

|| जगत तात (खेडुत) || . दोहा रचना : जोगीदान गढवी (चडीया)

.           || जगत तात (खेडुत) ||
. दोहा रचना : जोगीदान गढवी (चडीया)
अथरो था मत आदमी, धर ने थोडिक धीर
जोड्य बडद नी जोगडा, विनवे खेडुत वीर
उगसे सुरज ऐकदी,(नीत) रहे न खेडुत रात
जोतर धारी जोगडा,(तने) विनवी करता वात
क्यांथी नांणा काढवा, बिजवारा ना बाप
ज्यारे पाके जोगडा, भाव थता त्यां भाप.
गीरो पड्यां घर गाममां, खुदनी रही न खेर
तोय
जगत तात कई जोगडा, करता नेता  केर
खोप कर्यो छे खेतरे,(ई) कोई धरे नई कान
जगत तात नो जोगडा, मरो पुरो तुं मान
गणता जेने गरीबनी, (अहीं) कस्तुरी कइ केक
ई, सो ये पोहची सेक, (हवे)जमवुं सेमां जोगडा
दुघ माटे सउ दोडता, छांटो मळे न छास
जुवोन केवी जोगडा, अच्छे दन की आस
खरा मघाने खेतरे, (जई)खेडुत करतो  खंत
जरी न जाणें जोगडा,आणे भावो अंत
पांणत करतो प्रेमथी, बळद्या ने के बाप
ऐनी
मोटप केरुं माप, जडे न गोत्युं जोगडा
कंण पड्याता कोठीये, खेतर नाख्या खोई
हवे
रहीयें  बेठा रोई, (आ) जोतां भावो जोगडा
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