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8 जुलाई 2016

देव गढवीनी रचना

खफा खफा सी है जींदगी कुछ तो बात होगी
हर वख्त झहन में तुं है कुछ तो बात होगी

हर शब आती है सुलाने के लीए मुझे फीर खुद शब ही सो जाती है कुछ तो बात होगी

क्युं हर दर्द से रिश्ता बना रहता है मेरा
आरजु-ए-सुकुन की सजा है कुछ तो बात होगी

बडे एहतराम से छेडा है गम-ए-दील के तार को
फीर भी ये शोर-गुल क्युं कुछ तो
बात होगी

सरकते जा रहे हेै हाथों से बे-शबब "देव"
जो रिश्ते थे कभी खास कुछ तो बात होगी

   @देव गढवी
नानाकपाया-मुंदरा
      कच्छ

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