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12 जुलाई 2016

अलंकार नी ओळख...जोगीदान गढवी (चडीया)

.    *|| अलंकार नी ओळख...||*
.     *जोगीदान गढवी (चडीया)*
साहीत्यमां कुल नव रस छे...
दा.त. (दाखला तरीके)
बिभत्स अदभुत बातमे, भणों रुद्र भेंकार
जो करुंणा विर जोगडा, शांत हास्य सृंगार.
(१.बिभत्स, २.अदभुत, ३.रुद्र (रौद्र), ४.भेंकार (भयंकर)
५.करुण, ६.विर, ७.शांत, ८.हास्य, ९.श्रृंगार)
बधुय  साहीत्य आ नव रसो ने गातुं आव्युं छे.पण
ऐने सुमधुर साहित्य और रुचिकर बनाववा माटे
अलंकार चंद्रोदय मां घणा बधा अलंकारो नुं विवरण है..
जोके सामवेद मां तो जगती गायत्री ईत्यादी हजारो छंदो नी
वात छे पण आपडे अहींया थोडा अलंकारो पर ऐक नजर
नाखीये जेथी नवा  कवियो नेकाव्य रचना मां सरलता रहै ऐज
उदेस्य छे.....
अलंकार ना बे विभाजन छे, १. शब्दालंकार , २. अर्थालंकार
जेमां प्रथम छे जेने समजीये तो....शब्दालंकार मां त्रण अलंकार छे
१. *वर्णानुप्रास*
जेमां ऐकज वर्ण  नी पुनरोक्ति थती होय...
दा.त.
जीवतर जोने जोगडा, जोया जेवुं जाय.
गुंण गणांवी गाममां, गुरुवर गांणा गाय.
प्रथम बे चरण मां "ज" अने त्रीजा चोथा मां "ग"
वर्ण नी वारंवार पुनरोक्ती थी वर्णानु प्रास अलंकार थाय
जेने घणां वर्ण सगाई ना नामे पण जांणे छे....
२. *शब्दानु प्रास अलंकार*
(यमक अलंकार )
जेमां ऐक सरखा उच्चार वाळा शब्दो आववाथी आ अलंकार
बने छे जेने यमक अथवा शब्दानु प्रास कहे छे..
दा.त
त्रय लोचन तडीया. आग उघडीया. धोम धखडीया. तणघडीया
चारण गण चडीया. जोगीह जडीया. दानही दडीया. दडवडीया.
कर दुर दखडीया. सौप सुखडीयां. हिये ह्रखडीया. हणणाटी.
नम हर शिव शंकर. डाक डणंकर. धोम धणंकर. धणणाटी.
३. *अत्यानु प्रास अलंकार*
ज्यारे बे पंकती ना अंतमां समान उच्चार वाळा शब्दो आवे त्यारे
अत्यानु प्रास अलंकार बने....
दा.त.
दाम हाम सुख दैवणी.कंचन करणी काय.
जग पर तारी जोगडा.रख वाळी रव राय.
,
ज्यारे अर्थालंकार मां अनेक अलंकारो छे.....
जेमां थी चाळीशेक नो उपयोग वधु थाय छे...
बिजानी अडधा ने खबर नथी तथा अमुक तो
भाषाओ मां लुप्त थता गया छे...
चालता अलंकारो मां......
१. *उपमा अलंकार*
जेमां जेवा, जेवुं, जेवी, समान, सरखी जेवा शब्दो आवे
फुल सरीखी फांकडी, कंचन जेवी काय
जोगी जेवा जोगडा, जग्ग हीते स्रग जाय
२. *यमक अलंका*
ज्यारे एकनो एक शब्द काव्य मां वारंवार आवे अने दरेक वखते तेनो अर्थ अलग थतो होय त्यारे यमक अलंकार बने,
मारग ने अब्ब मा रग,  मा रग समजे मौन
जे वण हेते जोगडा ,कहसी दुसरो कौन
(१.मारग =रसतो, २.मा रग= करगरीस नही, ३.मा रग = माता नी जे रग छे ते मौन ने पण समजे)
३. *आंतरप्रास अलंकार*
जे अलंकार मां काव्य नी वच्चे प्रास आवतो होय जेने प्रास सांकळी पण केहवामां आवे छे जेमके
कडड दंत कडेडाट,नाट नटराज नचायो
धडड धरा धडेडाट, दाट दैतांण डचायो हडड धस्यो हनुमान,दान जोगड दरसायो
गणणण करंतो गान, जान की वर नभ गायो
उपर ना उदाहरण मां प्रथम पंक्ती नो अंत प्रास लई बीजी पंक्ती सरु थाय छे जेमके , कडेडाट - नाट
धडेडाट - दाट
हनुमान - दान
गान - जान
४. *उत्प्रेक्षा अलंकार*
आ अलंकार मां, जांणे , जेवा शब्दो थी कोई एक वस्तु ने बिजा साथे सरखावाती होय छे
दा,त,
प्रताप जांणे प्राहटे, तरकां पर तरवार
एवी
धरणी माथे धार, जो दे मेघो जोगडा
५,  *रुपक अलंका*
आ अलंकार मां उपमेय ने उपमा तरीकेज बतावाय छे, जेमके
विंणाय कविनी वातडी, आंख्युं चारण आग
तेनो को दन ताग, जडे न कोने जोगडा
(चारण नी वात एटले सरस्वती नी विंणा, अने आंख एटले आग )
६, *व्यतिरेक अलंकार*
आ अलंकार मां उपमेय ने उपमा करतां पण चडीयातुं बतावाय छे
सबदां तारा सारणा, तरवारुं थीय तेज
अस्त्रो करतां ऐज, जोम भरंडी जोगडा
७. *अनन्वय अलंकार*
आ अलंकार मां उपमेय ने पोतानी ने पोतानीज उपमा आपी तेनुं अनन्य महत्व दर्सावाय छे दा,त,
शुं उपमा दउं शामळा, हरीवर तुज ने हूं
जगमां कशुं न जोगडा, तुं एटे बस तूं
८. *व्याजस्तुती अलंकार*
आ अलंकार मां वखांण ना मां निंदा थती होय छे, अने क्यारेक निंदा ना स्वर मां वखाण,
विरता खुब वखांणीये, खई ग्यो सावज खड
जुवो मरद ई जोगडा, भागी न आव्यो भड
९. *श्लेष अलंकार*
आ अलंकार मां काव्य के वाक्य मां कोई ऐक शब्द ना बे के तेथी वधु अर्थ थता होय छे,
गुजरी जई ने गोतवा तो, बहरी पाडे बूम
जोहरी सुणे न जोगडा, गोहरी थई गई गूम
गुजरी जवुं (बजार जवुं / मरी जवुं)बहरी(बमणा जोरे/ श्रवण सक्ति वगरनी बेरी) जोहरी (जवेरी / जो हरी ,हरी व्यक्ति नुं नाम) गोहरी (गोहार करनार/ गोहरी उर्फ गौरी नुं देसी नाम)
१०. *सजीवारोपण अलंकार*
आ अलंकार मां निर्जीव वस्तु सजीव जेवुं काम करती दर्सावाय  छे, दा.त.
बोल्युं फुलडुं बाग मां, वात सुंणो विदवान
जोया मेंतो जोगडा, कैक  दीवाले कान
फुल बोलवुं , अने दीवालो सांभळवी एटले के दीवालो ने कान होवा वगेरे सजीवा रोपण अलंकार ना उदाहरण छे,
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