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13 अगस्त 2016

आवी जवु कवि: "जय"। - जयेशदान गढवी।

।। आवी जवु ।।

*अचानक होठ पर तारा, नाम नु आवी जवुं।
जाणे रण वचाळे झरणा ना गाम नु आवी जवुं।

* कया हक्क थी तने याद करू? ऐय सवाल छे।
केम विसरे जीवन मा कोइ, सौंदर्य धाम नु आवी जवुं।

* प्याला ने होठ नो संजोग नहि होय नशीब मा।
ओछुं मादक न हतुं, हाथ मा जाम नु आवी जवुं।

* बधी लज्जा ना पर्दा उडी जता एक सामटा।
हजु सांभरे छे ऐ तारा स्मित, बेफाम नु आवी जवुं।

* प्रणय ना गुनाह नी सजा कठोर आपे छे जमानो।
(तोय)सुंवाळु लागे छे महोब्बत, ना इल्जाम नु आवी जवु ।

*घेरी वळेली भीड मा सुळवळी उठे छे एकांत।
बहानु दीधा करू मित्रो ने जरूरी, काम नु आवी जवुं।

*  छे जेमना माटे आ गझल ऐ नही वांचे नही सांभळे।
जेम बादशाह ना हजुर मा गरीब नी, सलाम नु आवी जवुं।

* इलम एक पण शूकून नो ज्यां कारगत न नीवडे।
तारा स्मरणे थाय अचानक, आराम नु आवी जवुं।

* "जय" गुलशन मा गुल नथी तो रोनक नथी खुश्बो नथी
महेफिल मा कंइक अधूरू लागे तारा विना, तमाम नु आवी जवुं।

* * * * * * * * * * * * *

- कवि: "जय"।
- जयेशदान गढवी।

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