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18 जुलाई 2017

हरिरस नी हेली -

.                *हरिरस नी हेली*
.            *महात्मा ईसरदासजी*

*दोहा गिनकर ऐक दस, हरिरस तणें हवाल*
*जुवो ईशर रुप जोगडा, सूंदर किया सवाल*

हरिरस मां गणी ने दस दोहाओ के जे 111 थी 121 मां पुज्य ईसर दादाये जे हरि ने सवाल कर्या छे ते तत्व वेत्ता नी तर्क एरणे टिपायेल मजबुत बांधणी ना सवालो छे...

*विंण अपराध विटंबतो, रे रे त्रिभुवन राय*
*कर कूडां शास्तर कथन, कर कुडां क्रम काय*

हे त्रिभुवन ना नाथ वगर अपराधे तमे दुख आपवा मांडो छो..तो कां शास्त्रो ना कथन खोटां छे एम कही दो...

*ऐह पटंतर दाख्य अब, भगतां वत्सल ब्रह्म*
*किधां अम के तुम कीयां,धुर हरी पाप धरम्म*

हे भक्त वत्सल ब्रह्म हवे ए कहे के सरव प्रथम आ धर्म अने पाप वगेरे जे छे ते अमे कर्यां के तें कर्या??

*ता हरि ईच्छा दीध तें, जीहां आदी जनम्म*
तितकित हुता अमतणां, केशव कशां करम्म*

हे केशव जो तारी ईच्छा थीज जो आ बधा जीव आदी नो जन्म थयो छे.. तो ए अमारो जन्म कया कर्म ने कारणे थयो.. जो कर्म प्रमांणे जन्म होय छे तो अमारुं ए वखते कयुं कर्म हतुं ?

*यह परपंच अमापरो, तूं करताह त्रिकम्म*
*आपोपें अळगो रही, कैंक भळावे क्रम्म*

हे त्रिकम तेंज आ बधी संसार माया ना प्रपंचो कर्या छे जेमां तुं अळगो रहे छे अने बिजा ने कर्मो भळावी दे छे..

*आदी तुजथी उपन्या, जग जीवन सह जीव*
*उंचा निचा अवतरण, दे क्युं वंश दईव*

हे जगजीवन आ सृस्टी समस्त तारा मांथीज जो उत्पन्न थई छे तो आ उंचा निचा वर्ण देव दानव वगेरे वंश ना भेद केम..?

*आपो पें हूता अनंत, आप्यो पें अवतार*
*पाप धरम क्यों पिडवा,लायो जीवां लार*

हे अनंत प्रथम आप पोते हता पछी अनंत रुप थई ने बधा जीवो ने अवतार आप्या पछी केम एमने पिडवा माटे पाप अने पुन्य लगाड्या??

*अखील तुंहिज के को अवर, बहु नामी बूझव्व*
*लखमी वर लेखां नही, समवड प्रांणी स्रव्व*

हे बहुनामी ..आ अखील जगत मां तुंज छे के बीजो कोई पण छे?  अने जो मात्र तुंज छे तो केम बधा एक सरखा नथी??

*आदि तणो जोतां अरथ, भांजे मुज ना भ्रम्म*
*पहला जीव परट्ठीया, किया के पहला क्रम्म*

हे हरि आ सृष्टि नो आदि नो अर्थ जोतां मारो भ्रम नथी भागतो...के पेहला जीव बनाव्या के पेहला कर्म बनाव्युं..?

*क्रम अकरम विकरम करे, तें जागवीया जीव*
*जगपती को जांणे नही, गत थारी हय ग्रीव*

हे जगतपती कर्म अकर्म विकर्म करी ने जीवो ने जगाड्या ..हे हयग्रीव तारी गती ने कोई जांणतु नथी..

*खांणी चार खोयण धरा, जिंण दिन जाया जन्त*
*किधा कूंण पाखे क्रसन्न, उत्तम मध्यम अन्त*

हे कृष्ण आ चार खांणी (जरायुज,अंडज,उदभिज,अने स्वदेज) मां भिन्न भिन्न जन्मो आप्या त्यारे कर्मो तो हताज नई.. तो आ उत्तम मध्यम कनिस्ट भेद कोंणे नक्की कर्या....?

*किधां कुंण पहुंचे क्रशन्न, वडा सामहो वाद*
*आ दिनको तोरी अनंत, आतम करम न आद*

हे कृष्ण मोटा सामे विवाद करी ने कोंण पोहच्युं छे..? आदी अनादी आप छो आत्मा के कर्म कांई आदी नथी... (चारणे चतुरता राखी सवालो संकेली लीधा..)

*क्रम गति पुछां तुं कने, गोविंद हूं गेमार*
*आड वसंती डेडरी, पुणे समुद्रां पार*

हे गोविंद हुं केवो गमार छुं के कर्म नी गती आप ने पुछवा बेठो छु..डेडकी सागर नी करे एवी वातुं थई...

*पोस्टः जोगीदान चडीया*
*मो.नं: 9898 360 102*

*भगवान श्री कृष्ण ने हजारो वंदन*

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