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10 मार्च 2018

||चाय ना दोहा || || कर्ता मितेशदान गढवी(सिंहढ़ाय्च) ||*

*||  *(चाय ना दोहा,सोरठा)*   ||*
*||मितेशदान गढवी(सिंहढ़ाय्च)||*

*चढे माथु चकड़ोळे,ठारे मगज नों ठा,*
(तो)
*मांडो पीवा मितराज,चुसकी लै ने चा(1)*

माथु चकडोळी गयु होय अने जो एवी मसालेदार चाय नो स्वाद जीभे चढी जाय तो तो भल भला चढ़ी गयेल माथा ना ठा(उच्च कक्षा नु अभिमान) उतरी जाय हो,

*आदु नाखी इलायची,भरसु कपले भा*
*मौज भरीने मितराज,(एनी)चूसकी लइशु चा(2)*

मौज त्यारे आवे ज्यारे चाय मा आदु अने इलायची नी सुगंध भरेल होय,एवी चाय कपला भरी भरीने पिवानी मजा ज अलग छे

*सेकीन रोटलो सेज,खाविंद हेतथी खा*
*मांडो आसन मितराज,(लइने)चुसकी भेरी चा(3)*

है कृष्ण,तु जरा अमारा त्या विहामो करवा आव अने, सवार नो टाढो रोटलो चुलाना धगधगता भाठा मा शेकी ने हेते तने खवरावीए अमे तो जो केवो आनंद आवे पछी तु जो आ चाय भेरी केटली रूडी लागे,

*सवार बपोर के सांज,नै पाड़े कोइ ना*
*मलसे माधव मितराज,(तने)चारण नेहडे चा(4)*

सवार के सांजे होय,दिवस होय के रांत एक वार तु चारण ना घरे मेहमानगति कर,घणी जग्याये तो चाय नो फिक्स समय हसे के सांजे नही पिवानी,खाली सवारे ज,पण चारण ना घरे एक वार आव गोविंद तने एना नेहड़े गरमा गरम ताजा दूध नी चाय नो स्वाद मळशे,

*परोढ थाये पीवता,घूंटडा घाएम घा*
*मुख गरम रे मितराज,चूसकी लेता चा(5)*

सवार ना समये ठंडी हवा आवती होय,पवन सुसवाटा करतो होय,एवा मा ठंडा पोर मा,चाय गरम लागे पण तोय चाय सबळाक,,,सबळाक देताकने पीता जाय,एवी तो चा नी मजा छे पिवानी,,

*चुंबन करता चायनु,उड़ेय आळस ऊंघ,*
(ज्यारे)
*मानो आ मितराय के,सजती नासेय सुंघ(6)*

घरमा चाय बनती होय,मसाला वाळी अने एनी सुगंध छैक नाक सुधि आवे तो सहू ने पण सजे एने ज के जेने चाय नो नशो खबर होय

*महळी आदु मांजरो,परभाते भरी पा,*
*मानो आ मितराय के,चूले चढे जे चा,(7)*

चाय मा आदु,काळा मरी,के तुलसी ना मांजर नाखी ने पीवो ने,अहाहाहा बहु आह्लादक स्वाद आवे हो,ए पिवानी  पण एक मजा छे,चा पीवी पण एक कला कहेवाय एने पीता जे जाणी गयु एने ज चाय नो नशो खबर पडे हो,,,

*घणा न पीवे घाटथी,घणा तो घायम घा*
*मानो आ मितराय के,चटपटती होय चा(8)*

घणा ने एवो पिवानो आनंद के धीमे धीमे पीवे,जेम के हु अने घणा घायम घा,
बस पी जाय पछी गरम गरम अड़ी जाय एटले,ओय बापा,actualy मने तो जीभ आवी छे,
पछी एसिडिटी थाय ज ने,

*नशो जेने जो चाय नो,(एने)कदी नडे नही काय,*
*मानो आ मितराय के,जे मोजेय पिता जाय(9)*

जेने चाय नशो रूप छे अने एनो भरपूर आनंद ले छे एने तो कोई दी कई नई थातु,मारो खुद नो अनुभव,जेने चाय नशो होय एतो मोजे मोजे पी ले,,,

*चाय जेवी न चाकरी,कदे न थाती क्याय*
ओली
*भली मिस्टानु भाय,मुखे न चढ़ती मितभा(10)*

गमे त्या महैमानगति करवा जाओ,त्या भले घणीय मिस्टानु होय पण चाय न मले तो तो मजाज न आवे,चाय नो रिवाज अगाऊ वर्षो थी छे,चाय नो स्वाद मुखे चढे एटले भल भली मिठाईओ ना स्वाद आघा रे हो,
आवी तो रूडी चाय छे,,


*🙏---मितेशदान(सिंहढाय्च)---🙏*

*कवि मित*

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